राजकीय महिला शरणालय में रह रही लड़की यदि बालिग है और वह अपनी मर्जी से जाना चाहती है, तो उसे बंदी नहीं बनाए रखा जा सकता। ऐसा करना स्वतंत्रता का हनन है, इसलिए लखनऊ के राजकीय महिला शरणालय में रखी गई लड़की को रिहा किया जाए।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राजकीय महिला शरणालय, लखनऊ की अधीक्षिका को दिया है। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि बालिग लड़की रिहाई के बाद अपनी मर्जी से जहां चाहे वहां रह सकती है।
इस मामले में पीड़ित लड़की ने अपने मित्र के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें उसने रिहा करने के लिए शरणालय अधीक्षिका को निर्देश देने की प्रार्थना की गई थी। हाईकोर्ट के पिछले आदेशों के बाद पीड़िता खुद हाईकोर्ट में प्रस्तुत की गई।
हाईकोर्ट ने उससे सवाल किए, जवाब में उसने बताया कि वह अपने मित्र के साथ रहना चाहती है। वह अपनी दादी के साथ रह रही थी, उसे नहीं पता कि उसके पिता कहां हैं।
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डेमो
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जांच एजेंसी ने भी अपनी जांच पर हलफनामा प्रस्तुत किया, जिसमें बताया गया कि लड़की की उम्र 17 वर्ष पाई गई है। हालांकि लड़की ने खुद को 18 वर्ष की बालिग बताया। उसने बताया कि वह अपनी मर्जी से अपने मित्र के मामा के साथ गई थी, और अब मित्र से शादी करना चाहती है।
जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस डॉ. विजय लक्ष्मी ने अपने निर्णय में कहा कि मौजूदा हालात और सामने आए तथ्यों के अनुसार लड़की अपने मित्र के साथ जाना चाहती है, दादी के साथ नहीं रहना चाहती, वह अपना निर्णय लेने की उम्र में पहुंच चुकी है, ऐसे में उसे शरणालय में बंदी बनाए रखना उसकी स्वतंत्रता का हनन है। अधीक्षिका को निर्देश दिए जाते हैं कि उसे रिहा किया जाए और अपनी मर्जी से जीने दिया जाए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
सामने आए तथ्यों के अनुसार लड़की अपना निर्णय लेने की उम्र में पहुंच चुकी है, ऐसे में उसे बंदी बनाए नहीं रखा जा सकता।