चिकित्सकों से मरीजों का इलाज करने के बजाय प्रशासनिक कार्य कराने को हाईकोर्ट ने अनुचित बताया है। कोर्ट का कहना है कि चिकित्सक मूल रूप से मरीजों की देखभाल के लिए हैं।
उन्हें उनके मूल कार्य से विरत नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के न्यायमूर्ति डॉ. देवेंद्र कुमार अरोरा और न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार द्वितीय ने एक याचिका की सुनवाई में यह टिप्पणी की।
चिकित्सकीय कार्य से हटाकर प्रशासनिक कार्य में लगाए गए डॉ. सुनील कुमार ने यह याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, हमारे प्रदेश में चिकित्सकों की कमी की वजह से उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति नहीं दी जा रही है। दूसरी तरफ उनसे मरीजों की देखभाल की जगह प्रशासनिक कार्य करने को कहा जा रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक कार्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन चिकित्सकों की नियुक्ति मूल रूप से मरीजों की देखभाल करने के लिए होती है। चिकित्सकों को उनके मूल काम से नहीं हटाया जा सकता।
अगर एक चिकित्सक या शल्य चिकित्सक को प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाएगा तो वह अपना कौशल खोने लगेगा। अदालत ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि आखिर याची को उसकी मांग के बाद भी चिकित्सकीय कार्य के लिए तैनात क्यों नहीं किया जा रहा है? मामले की अगली सुनवाई अब तीन मई को होगी। याची की तरफ से अधिवक्ता राघवेंद्र कुमार सैनी और नूतन ठाकुर ने पक्ष रखा।