विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बंगला।
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लोकप्रहरी ने उत्तर प्रदेश विधानमंडल से पारित नए अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सर्वोच्च अदालत में प्रदेश सरकार का पक्ष सुना। राज्य सरकार की ओर से पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला आवंटित करने के पक्ष में तर्क दिया गया।
कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री को विशेष दर्जे का लाभ दिया जा सकता है। कुछ अन्य उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भी आफिस छोड़ने के बाद विशिष्ट श्रेणी में रखा जाता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति शामिल हैं।
उन्हें पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं, यात्रा भत्ता, स्टाफ जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी आवास उपलब्ध कराने को गलत नहीं माना जा सकता। इस मामले में सर्वोच्च अदालत में न्याय मित्र बनाए गए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास सुविधा दिए जाने का विरोध किया था। सभी पक्षों को सुनने के बाद सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियो के आवास आवंटन को कानून जामा पहनाने वाले एक्ट को निरस्त कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित सरकारी बंगले लंबे-चौड़े क्षेत्रफल और शहर के सबसे पॉश इलाके में हैं। इनका रखरखाव सरकार करती है। राज्य संपत्ति विभाग इसके लिए सालाना बजट आवंटित करता है। ये सभी बंगले मामूली किराये पर आवंटित है। इनमें हर साल लाखों रुपये मरम्मत पर खर्च किए जाते हैं।
राज्य संपत्ति विभाग पूर्व सीएम के बंगले की मरम्मत के लिए सालाना 25 लाख रुपये तक की धनराशि स्वीकृत कर सकता है जबकि इनसे किराया नाममात्र का लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट से आदेश से पहले एक से पांच एकड़ तक में बने इन बंगलों में विक्रमादित्य मार्ग स्थित मुलायम सिंह के आवास का किराया सर्वाधिक 13,478 रुपये मासिक था। सबसे कम किराया 4625 रुपये किराया रामनरेश यादव के बंगले का था।
22 नवबंर 16 को राम नरेश यादव की मृत्यु हो जाने पर उनके बंगले का आवंटन निरस्त कर दिया गया है। दो बंगलों को जोड़कर बनाए गए मायावती के आवास का किराया मात्र 12,500 रुपये प्रतिमाह था।