कांग्रेस, सपा और बसपा जैसी पार्टियों के बीच आम आदमी पार्टी ने वाराणसी में बेहद कम समय में ही मजबूत जमीन तैयार कर ली।
शुक्रवार को जिस तरह अरविंद केजरीवाल का रोड-शो निकला उससे आम आदमी पार्टी शक्ति प्रदर्शन की होड़ में कहीं उन्नीस नजर नहीं आई।
तीन किमी से ज्यादा लंबे काफिले वाले रोड शो से केजरीवाल यह मिथक भी तोड़ने में कामयाब रहे कि वे बाहरी हैं। आखिर ऐसी कौन सी चीजें हैं जिन्होंने पार्टी की स्वीकार्यता इतनी तेजी से बढ़ाई।
राजनीति से रोमांस करने पर किया मजबूर
कोई भी यह नकार नहीं सकता कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट ने नौजवानों में सामाजिक सजगता पैदा की थी और निश्चित तौर पर लोकसभा चुनाव 2014 का यह समय युवाओं को राजनीतिक तौर पर सजग करने वाला है।
बीएचयू में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. अशोक कुमार कौल कहते हैं कि केजरीवाल को लेकर पहले हमारी धारणा थी कि वे मात्र एक बबल की तरह हैं।
दरअसल दिल्ली में पार्टी ने जो कुछ किया, उसने युवाओं को राजनीति से रोमांस करने पर मजबूर कर दिया है।
हालांकि अन्ना के आंदोलन को उसने दिल्ली में कैश कराया लेकिन उसके प्रयास अपील करने वाले तो हैं, जिसने सामाजिक सोच को बदलने का काम किया है।
स्वीकार्यता के पीछे ये रही रणनीति
केजरीवाल के बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला होने के तुरंत बाद अरविंद के कैम्पेन मैनेजर गोपाल मोहन ने यहां डेरा जमाया।
इसके बाद शुरू हुआ दौर जनाधार बनाने का। मसलन कैंट विधान सभा क्षेत्र का जिम्मा मनीष सिसोदिया को देना और रोहनिया में जनाधार बनाने की जिम्मेदारी दिलीप पांडेय, सेवापुरी की कमान दुर्गेश पाठक, दक्षिण और उत्तर की क्रमश: कपिल मिश्रा और गुलाब सिंह को देना रणनीति का प्रथम हिस्सा था।
मनीष सिसोदिया एंड ग्रुप से जुड़े एक आप कार्यकर्ता का कहना है, शुरू में तो भाजपा के बंदों ने हमें धमकाया कि कैंट में आने की जुर्रत न करें, लेकिन हम दोबारा वहां पहुंचे तो उन्होंने ही हमसे हाथ मिलाया और तीसरी बार जब हमारी वहां एंट्री हुई तो हमें बैठा कर चाय पिलाई गई।
कहने का आशय यह है कि पहले लोगों को लगा कि हम डर कर भाग जाएंगे, लेकिन हमारी दृढ़ता ने उन्हें मजबूर किया कि वे हमें स्वीकार करें।
डोर-टू-डोर कैम्पेन और संवाद शैली काम कर गई
आप के राष्ट्रीय मीडिया को-ऑर्डिनेटर दीपक वाजपेयी बताते हैं कि हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारे वॉलंटियर हैं।
सबने बिना किसी लोभ के पार्टी की नीतियों को फॉलो किया और तय कार्यक्रमों के अनुसार लोगों तक पहुंचने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
मुख्य तौर पर हमने जो रणनीति अपनाई, उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही डोर-टू-डोर कैम्पेन की। इसके अलावा केजरीवाल ने जब लोगों से ‘संवाद’ स्थापित करना शुरू किया तो इसका फायदा हमें मिला।
होर्डिंग वार से इतर स्टाइल
मीडिया कोऑर्डिनेटर प्रेरणा प्रसाद कहती हैं कि पार्टी नेतृत्व तय कर चुका था कि हमें चुनाव खर्च को कम से कम रखना है।
अन्य पार्टियों ने जहां लाखों रुपये होर्डिंग्स, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन पर खर्च कर दिए, हमने अपने स्टाइल में लोगों से बात की।
एक ओर जहां नंदन के नेतृत्व में ‘प्ले फॉर चेंज’ चल रहा था, वहीं समन कुरैशी की अगुवाई में शहनाई लेकर वॉलंटियर अलसुबह निकल पड़ते थे बनारस की गलियों में।
इससे न केवल हम लोगों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं बल्कि उनके भ्रम को भी दूर कर पाए। निसंदेह आईटी मैनेजमेंट ने भी हमारे जनाधार को मजबूत किया है।
अपनी पहचान बनाने में सफल रही ‘आप’
राजनैतिक विश्लेषण तो यही कहता है कि आम आदमी पार्टी ने लोगों को खुद को स्वीकार करने को मजबूर कर दिया।
यह सच है कि दिल्ली में जो कुछ केजरीवाल ने किया, उससे उनकी और पार्टी की छवि को नुकसान हुआ, लेकिन उसकी भरपाई वाराणसी में बने जनाधार से होती दिख रही है।
प्रचार की एक नई शैली और संवाद कायम करने की पार्टी की क्षमता इस सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा जिन मुद्दों को अन्य राजनीतिक दलों ने बिल्कुल नहीं छुआ, उन मुद्दों को केजरीवाल जनता के बीच ले गए।
साबित किया कि आम आदमी राजनीतिक दलों के एजेंडे में नहीं है। जहां तक सवाल राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पहचान पाने का है तो एक कदम तो बढ़ा ही दिया है।
-प्रो. आरआर झा, डीन, फैकल्टी ऑफ सोशल साइंसेज, बीएचयू