सरकारी स्कूलों पर यूं ही ‘मजबूरी के स्कूल’ का टैग नहीं लगा। सूबे में 26,379 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो एक कमरे में सिमटे हैं। यह आंकड़ा कुल सरकारी स्कूलों का 11 फीसदी है। 10 फीसदी स्कूल दो कमरों तो 10 फीसदी तीन कमरों में चलते हैं। यह हकीकत प्राइमरी लेवल तक के स्कूलों पर स्कोर संस्था के हालिया सर्वे में सामने आई है।
अब इन स्कूलों में पढ़ाई की क्वालिटी की बात करें तो एक अन्य संस्था ‘असर’ की सर्वे रिपोर्ट बताती है कि 67 फीसदी कक्षा चार के बच्चे कक्षा दो के हिंदी का पाठ भी नहीं पढ़ पाए। अंग्रेजी, गणित की तो बात ही छोड़िए। हाईकोर्ट ने अफसरों, जजों और नेताओं के बच्चों को जिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के आदेश दिए हैं उन ‘मजबूरी के स्कूलों’ में क्या हालात हैं, सर्वे में क्या सामने आया, पेश है रिपोर्ट....
सिर्फ 9 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में पांच से ज्यादा कमरे
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 23 फीसदी सरकारी प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जहां पांचवीं तक की पढ़ाई के लिए पांच या कक्षाएं हैं। केवल नौ फीसदी स्कूल ऐसे हैं जहां पांच से अधिक कक्षाएं हैं। वहीं 13 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां चार कक्षाएं हैं।
21 फीसदी शिक्षक तो पढ़ाने ही नहीं आते
सर्वे के दौरान सामने आया कि 21 फीसदी शिक्षक कक्षा में पढ़ाने ही नहीं पहुंच रहे। यही नहीं 6.8 फीसदी शिक्षकों की जगह कोई दूसरा ड्यूटी करते मिला। शिक्षकों का अनुपात (प्राइमरी 30:1 और अपर प्राइमरी 35:1) भी पूरा नहीं मिला। 39 फीसदी प्राइमरी स्कूलों में समस्या का हल निकालने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं मिली। यानी इन स्कूलों में एडमिशन न मिलने, शिक्षक के गैरहाजिर रहने, शौचालय नहीं होने जैसी शिकायतों पर कोई सुनवाई की कोई व्यवस्था ही नहीं है।
न हिंदी पढ़ पा रहे न अंग्रेजी
पढ़ाई की गुणवत्ता सरकारी खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में क्या है, उस पर ‘असर’ संस्था की वर्ष 2014 की सर्वे रिपोर्ट बेहद भयावह तस्वीर पेश करती है।
यह रिपोर्ट बताती है कि तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले 91.2 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी का एक वाक्य भी नहीं पढ़ पाते। पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों का भी ऐसा ही हाल रहा।
महज 21.1 प्रतिशत बच्चे ही पूरा वाक्य पढ़ पाए वह भी जो बेहद सरल था। कक्षा चार के 67 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा का हिंदी का पाठ भी नहीं पढ़ पाए। पांचवीं कक्षा के 44.7 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ पाए।
सवाल लगाना तो दूर अंकों की पहचान भी नहीं कर पा रहे
रिपोर्ट बताती है कि पांचवीं कक्षा के 75 फीसदी बच्चे भाग और 69 फीसदी घटाना के सवाल नहीं लगा पाए। 5.6 फीसदी बच्चे तो ऐसे मिले जोकि 0-9 तक के अंकों की भी सही से पहचान नहीं कर पाए।
26.6 फीसदी ही ऐसे बच्चे थे जो कि 100 तक के अंकों की पहचान कर सकते थे। पर, लिखने की बारी आई तो 73.4 फीसदी 99 तक की संख्या भी नहीं लिख पाए। रिपोर्ट बताती है कि पिछले सालों की तुलना में भी पढ़ाई की गुणवत्ता में कोई खास बदलाव नहीं हुआ।
कक्षाएं नहीं तो ‘गोल’ में पढ़ते हैं बच्चे
कक्षाओं की कमी का असर यह है कि बच्चे अपने से जूनियर या सीनियर की क्लास में बैठकर पढ़ रहे हैं। यानी एक ‘गोल’ बन जाती है। सर्वे के दौरान पाया गया कि 63.7 फीसदी स्कूलों में दूसरी कक्षा के बच्चों को अपने से नीचे या ऊपर के स्तर की कक्षा में बिठाया गया था। वहीं चौथी कक्षा के बच्चों का यह आंकड़ा 60.8 फीसदी था। इन बच्चों को अपने साथ के बच्चों की जगह दूसरी कक्षा में बिठाकर पढ़ाया जा रहा था।
लखनऊ में भी बुरा हाल
- 6-14 साल के 55.4 बच्चे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं
- 6-14 साल के 2.8 प्रतिशत बच्चे स्कूल ही नहीं जाते
- कक्षा-2 तक के 64.8 प्रतिशत बच्चे ही शब्द पढ़ पाए
- कक्षा-2 तक के70.2 प्रतिशत बच्चे 0-9 तक के अंक पहचान सके
- कक्षा 3-5 के 32.9 प्रतिशत बच्चे ही घटाना या भाग का सवाल लगा पाए
सरकारी शिक्षा की मार्क्सशीट
वर्ग--रिजल्ट
छात्र-शिक्षक अनुपात--19.9 प्रतिशत में पूरा
कक्षा-शिक्षक अनुपात--20.2 प्रतिशत में अधूरा
खेल का मैदान--21.9 प्रतिशत में नहीं
पीने का पानी--14.2 प्रतिशत में नहीं
शौचालय--45.1 प्रतिशत में नहीं
लड़कियों के लिए शौचालय--38.6 प्रतिशत में ताला बंद मिला
लाइब्रेरी की सुविधा--63.9 प्रतिशत में नहीं
(असर संस्था की रिपोर्ट-2014)
फैक्ट फाइल, यहां देखें
- 2,39,817 कुल प्राइमरी स्कूल
- 68 प्रतिशत सरकारी
- 32 प्रतिशत निजी
- 88.67 प्रतिशत ग्रामीण इलाके में सरकारी स्कूल
- 11.33 प्रतिशत शहरी इलाके में हैं सरकारी स्कूल
- 61 प्रतिशत सरकारी प्राइमरी स्कूल में छात्रों की उपस्थिति
- 81 प्रतिशत निजी प्राइमरी स्कूल में छात्रों की उपस्थिति
- 65 प्रतिशत सरकारी अपर प्राइमरी स्कूल में छात्रों की उपस्थिति
- 89 प्रतिशत निजी अपर स्कूल में छात्रों की उपस्थिति
(स्कोर रिपोर्ट-2014)
कोठारी आयोग की रिपोर्ट ताजा
1966 में जस्टिस कोठारी आयोग ने समान स्कूल प्रणाली की सिफारिश की थी। हाईकोर्ट के आदेश ने इस आयोग की रिपोर्ट को ताजा कर दिया। पॉलिसी मेकर्स के बच्चे अगर सरकारी स्कूलों में जाएंगे तो स्थिति खुद से बेहतर हो जाएगी।
नौकरशाहों के बच्चे पढ़ेंगे तो सुधरेगा हाल
नेशनल आरटीई फोरम के संयोजक अंबरीश राय का कहना है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहा है। गरीबों के साथ नौकरशाहों के बच्चे इनमें पढ़ेंगे तो नि:संदेह स्थिति बेहतर होगी। निजी स्कूलों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि सामान्य लोग सोचते हैं कि केवल मिशनरी और पब्लिक स्कूलों में ही गुणवत्तापरक शिक्षा मिलती है। सरकारी तंत्र को अपने बच्चों को वापस सरकारी स्कूलों में लाना होगा।
वहीं, स्कार के सह-संयोजक बिनोद सिन्हा का कहना है कि हाईकोर्ट का फैसला स्वागत योग्य है। अगर सरकारी अधिकारियों और नेताओं के बच्चे सरकारी स्कूल में जाएंगे तो उन्हें संसाधनों और गुणवत्ता की चिंता होगी। जब संसाधन और शिक्षकों की गुणवत्ता सुधरेगी तो पढ़ाई का स्तर खुद ही बेहतर होगा। सिविल सोसाइटी इसमें मदद करेगी।