यहीं पर उसकी मुलाकात विवेक राठौर से हुई। इस दौरान दोनों के बीच काफी गहरी दोस्ती हो गई। बातचीत के दौरान सेना में भर्ती के नाम पर लाखों रुपये कमाने की साजिश रच ली। इसके लिए दिल्ली में बैठे जालसाज से संपर्क किया जोकि गिरोह का मास्टर माइंड है।
उसकी मदद से फर्जी दस्तावेज तैयार कर ठगी का धंधा शुरू कर दिया। विवेक व उसका दोस्त सिद्धार्थ बेरोजगारों को सेना में भर्ती कराने के नाम पर फंसाते थे। उनसे रकम वसूल कर हर्षवर्धन के सामने पेश करते थे। हर्षवर्धन उनसे बातचीत करता था।
इस दौरान हर्षवर्धन सेना की वर्दी में रहता था। ताकि किसी को संदेह न हो। बेरोजगारों से रकम ऐंठने के बाद उसको फर्जी नियुक्ति पत्र पकड़ा देते थे। साथ ही उसे मेडिकल जांच के लिए भेज देते।
पुलिस के मुताबिक, झांसे में फंसे बेरोजगारों को शक न हो इसलिए गिरोह सेना के फर्जी लेटरपैड पर ट्रेनिंग स्थल जाने के लिए ट्रेन और हवाई जहाज के टिकट के बंदोबस्त की जानकारी देता था। बाद में पता चलता कि जो पीएनआर या नंबर दिया गया है वह फर्जी है।
बेरोजगार युवकों को ट्रेनिंग में क्या करना है, कितना सामान लेकर जाना है, किस तरह का व्यवहार करना है, इन सब की एक सूची भी उपलब्ध कराई जाती थी। यह सूची वैसे ही होती जैसा सेना में भर्ती होने के बाद हर रंगरूट को दी जाती है। साथ ही एक एग्रीमेंट पेपर पर दस्तखत कराया जाता, जिसमें सेना में भर्ती के दौरान मिलने वाली सारी शर्तें होती थी।