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'विजन फॉर डेवलपमेंट' से तय होगा यूपी का सिकंदर

Mon, 24 Nov 2014 12:40 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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यूपी का अगला विधानसभा चुनाव विकास के एजेंडे पर ही लड़ा जाएगा। विकास के नाम पर केंद्र में मोदी की सरकार बनने और उसके बाद के माहौल में यह मुद्दा यूपी समेत सभी राज्यों के लिए अहम होता जा रहा है।
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2017 में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि यूपी का विकास करने का विजन किसके पास है? वह कौन सा दल है जिसके पास प्रदेश के विकास का सही रोडमैप है? किस पार्टी के पास इसके लिए अच्छी नीयत और नीतियां हैं?

वे कौन लोग हैं जिन पर प्रदेश की जनता भरोसा कर सकती है? यूपी की सियासत का यह पहलू आम जनता के लिए बेहद सुकून की बात है। उसके सामने बेहतर चुनने का विकल्प होगा।
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मायावती के भ्रष्टाचार को हथियार बनाकर सत्ता में आए अखिलेश यादव खुद विकास के मुद्दे को धार देने में जुटे हैं। एक के बाद एक योजनाओं के शिलान्यास के पत्थर अगले चुनाव में उनकी परीक्षा लेंगे।

चुनाव के वक्त पूरी होंगी ज्यादातर योजनाएं

सपा सरकार के कुछ शुरुआती साल अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता, विवादों और अफवाहों की वजह से दंगे आदि से निपटने में ही बीत गए, लेकिन इन सबसे उबरकर अखिलेश ने अब विकास के एजेंडे पर मजबूती से कदम आगे बढ़ाए हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से लेकर लखनऊ में आईटी सिटी की स्थापना, मेट्रो रेल और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे पर काम शुरू हुए हैं। यही तीन परियोजनाएं अब अखिलेश यादव के लिए लिटमस टेस्ट साबित होने वाली हैं।

सत्ताधारी दल को इसका लाभ तभी मिल पाएगा जब चुनाव से पहले इन परियोजनाओं में पारदर्शिता के साथ काम होगा। कार्यान्वयन के स्तर पर इन परियोजनाओं में किसी तरह की कमी सरकार की साख पर तो बट्टा लगाएगी ही, अखिलेश यादव और उनकी पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर भी गहरा असर डालेगी।

अखिलेश सरकार ने इन सभी विकास योजनाओं को पूरा करने का वक्त चुनाव के आसपास तय किया है। अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि सरकार की यह रणनीति कितनी कामयाब रहती है।

विकास और उसके प्रचार को दी जा रही तवज्जो

शासन के पहले दौर में अखिलेश सरकार का जोर लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ता बांटने को लेकर ही रहा। अलग-अलग समुदायों के लिए भी कई लुभावने कार्यक्रम चलाए गए, लेकिन लोकसभा चुनाव में इनका लाभ नहीं होते देख सरकार ने अपना फोकस बदल दिया है।

अब ऐसी योजनाओं पर जोर दिख रहा है जिनका लाभ पूरे प्रदेश को मिले, सभी वर्ग को मिले। हालांकि इनके जरिये सपा सरकार की कोशिश अपनी पार्टी के मजबूत गढ़ को और मजबूती देने की भी है।

जिस तरह नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे और उससे जुड़ी परियोजनाओं के जरिये मायावती ने अपने गृह क्षेत्र को बड़ा तोहफा देने की कोशिश की थी, उसी तर्ज पर अखिलेश सरकार ने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे के जरिये अपने घर को मजबूत करने की कोशिश की है।

बहरहाल, प्रदेश में विकास और उसके समुचित प्रचार को अब ज्यादा तवज्जो मिलने लगी है। सरकार की नीति में यह बदलाव उसकी नई चुनावी रणनीति और सियासी मजबूरी दोनों है।
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पहली बार मिली ऐसी चुनौती

प्रदेश में विधानसभा के चुनाव भले ही अभी सवा दो साल दूर हैं, पर तैयारी अभी से दिख रही है। यह भी पहली बार ही है कि पांच साल के कार्यकाल वाली सरकार चुनने के बाद प्रदेश की जनता अभी से ही अगली सरकार की रूपरेखा पर चर्चा करने लगी है।

इससे पहले यूपी के किसी भी सियासी दल के  सामने ढाई साल पहले से चुनावी तैयारी करने की चुनौती नहीं पेश आई, लेकिन इस बार यह चुनौती दिख रही है। यह अच्छी बात है कि अखिलेश सरकार ने इस चुनौती को जान-समझ लिया है।

उसने अपनी सारी ताकत विकास योजनाओं पर काम करने पर लगा दी है। मुख्यमंत्री के पास मात्र यही विकल्प है, जिसके बूते वे लोगों के बीच अपनी बात रखने जा सकेंगे।
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