लखनऊ। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ रही है। केजीएमयू और पीजीआई की साझा रिपोर्ट के मुताबिक, आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची वाली दवाओं में से प्रदेश के जिला अस्पतालों में 85 फीसदी दवाएं माैजूद हैं, मगर त्वचा, विषनाशक और विभिन्न जांच से पहले दी जाने वाली दवाओं की कमी है। वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 80 फीसदी दवाओं की उपलब्धता को बेंचमार्क माना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी देशों को जीवनरक्षक दवाओं की सूची तैयार करने का निर्देश दे रखा है। देश में वर्ष 2022 में आवश्यक दवाओं की पांचवीं राष्ट्रीय सूची जारी की गई थी। इसके मुताबिक, कुल 384 श्रेणियों की दवाएं जिला अस्पताल में होनी चाहिए। 27 सेक्शन में बांटी गईं इन दवाओं की कुल संख्या 459 तक पहुंचती है।
वहीं, केजीएमयू और पीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभागों ने जनवरी से जून 2023 के बीच जिला अस्पतालों में माैजूद दवाओं का परीक्षण किया। इसमें देखा गया कि दवाओं की उपलब्धता 85 फीसदी के करीब है। एनेस्थीसिया, डायलिसिस समेत अन्य दवाएं पर्याप्त मात्रा में माैजूद मिलीं।
यह रिपोर्ट जर्नल ऑफ हेल्थकेयर क्वालिटी रिसर्च में प्रकाशित हुई है। इसमें अनमोल जैन, नितिन दत्त भारद्वाज, एम. सुहैब, पी. श्रीवास्तव, एस. खान, एस. रावत, नाद जैन, एम. भारद्वाज और महविश सुहैब शामिल रहे।
विषनाशक दवाएं सिर्फ 53.85 फीसदी मिलीं
अध्ययन के दाैरान देखा गया कि अस्पतालों में सबसे कम उपलब्धता एंटीडोंट्स यानी विषनाशक दवाओं की ही थी। अस्पतालों में इनकी उपलब्धता का प्रतिशत 53.85 फीसदी था। इसके बाद 57.14 फीसदी उपलब्धता डायग्नोस्टिक एजेंट यानी विभिन्न जांच से पहले दी जाने दवाओं की रही। त्वचा संबंधी दवाओं की उपलब्धता भी सिर्फ 58.33 फीसदी ही थी।
आठ प्रकार की दवाओं की उपलब्धता शत-प्रतिशत
अस्पतालों में एनेस्थीसिया, एंटीएलर्जी, ड्यूरेटिक यानी पेशाब संबंधी गड़बड़ी, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, सांस संबंधी, जल इलेक्ट्रोलाइट-एसिड-बेस की गड़बड़ी ठीक करने वाली और कोविड-19 महामारी की दवाएं शत-प्रतिशत उपलब्ध हैं।