देवा (बाराबंकी)। देवा क्षेत्र के सलारपुर स्थित कंडेलेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन रविवार को नारायण आश्रम सीतापुर से पधारे कथावाचक पंडित श्रवण शुक्ल ने माता पार्वती के जन्म की कथा का वर्णन किया, जिसे सुनकर माहौल भक्तिमय हो गया।
उन्होंने कहा कि जिस समय भगवान शिव अपने मन में सती जी का परित्याग करने की बात ठान लेते हैं। उसी समय आकाश मार्ग से कई देवता जाते हुए दिखाई देते हैं। तो सती जी भगवान शिव से पूछती हैं कि हे प्रभु ब्रह्म, विष्णु सहित सभी देवता कहां जा रहे हैं। तो भगवान शिव ने कहा, हे देवी ये समस्त देव आपके पिता महाराज दक्ष के यज्ञ में जा रहे हैं। सती जी ने कहा, प्रभु हमको भी चलना चाहिए। भगवान शिव ने कहा कि हमारा निमंत्रण नहीं है, इसलिए हमारा जाना उचित नहीं है। लेकिन सती जी के बार-बार कहने पर शिवजी ने कहा कि देवी तुम जाना चाहो तो जा सकती हो। इस प्रकार सती जी पिता के यज्ञ आयोजन में पहुंचती हैं। तो देखती हैं कि समस्त देवता अपने अपने आसन पर विराजमान हैं। लेकिन भगवान शिव का आसन ही नहीं लगा है। तो सती जी विचार करती है कि जहां मेरे पति का सम्मान नहीं, वहां मेरा जीवित रहना व्यर्थ है। ऐसा विचार करके सती जी यज्ञ कुंड में प्रवेश करतीं है और अपने आपको अग्नि के हवाले कर दिया। जिस समय सती प्राण त्याग रही थीं, उसी समय सती मरत हरि सन वर मांगा, जनम जनम शिव पद अनुरागा, माता सती भगवान विष्णु से वरदान मांगती हैं कि मुझे हर जन्म में भगवान शिव ही पति रूप में प्राप्त हों। इसी के फलस्वरूप तेहि कारन हिमगिरि ग्रह जाई, जन्मी पार्वती तन पाई, सती जी राजा हिमांचल की पार्वती के रूप में जन्म लेती हैं और समूची हिमांचल नगरी में उत्सव मनाया जाता हैं। उसी समय देवर्षि नारद राजा हिमांचल के यहां आते है। देवर्षि को देखकर राजा बहुत प्रसन्न होते हैं और सम्मान क साथ नारद को अंदर ले जाते हैं और पुत्री का नामकरण संस्कार करने को कहते हैं। पुत्री को देखकर नारद जी मन मन ही प्रणाम करते हैं और नामकरण करते हुए कहते हैं कि हे राजन ये बहुत ही दिव्य कन्या है। ये सारे गुणों से पूर्ण है। समिति के सचिव दीपक सिंह ने बताया कि सोमवार से रात्रि में भागवत कथा के साथ साथ शिवम झांकी ग्रुप लखनऊ द्वारा मनमोहक झांकियां दिखाई जाएंगी।