लोकसभा चुनाव में जीत के लिए सूबे की सरकार ने चुनाव के पहले तमाम कदम उठाए थे। इन्हीं प्रयासों में नई तहसीलों का गठन भी शामिल रहा।
पर, यह फार्मूला भी जीत में मददगार साबित नहीं हो सका। चुनाव नतीजे आने के बाद कुशीनगर व उन्नाव में तीन नई तहसीलें सृजित करने के प्रस्ताव पर अनिश्चितता बढ़ गई है।
प्रदेश में सपा की सरकार आने के बाद दो साल के भीतर तीन चरणों में 11 नई तहसीलें बनाई गई थीं। इनमें कई तहसीलें चुनाव के कुछ दिन पहले बनाई गईं।
अधिकतर तहसीलों की पैरवी सपा के घोषित लोकसभा प्रत्याशी कर रहे थे। लेकिन कानून-व्यवस्था सहित विभिन्न मोर्चों पर लोगों में नाराजगी बढ़ा चुकी सरकार की यह दरियादिली भी काम न आई।
मैनपुरी को छोड़ कहीं नहीं मिली जीत
सरकार ने ग्रामीण मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए तहसीलों को बनाने में मानक को भी नजरंदाज किया।
जनहित के नाम पर मानक को शिथिल कर तहसील बनाए गए। पर, मैनपुरी को छोड़ दिया जाए तो सत्ताधारी दल को नई तहसीलों वाले किसी क्षेत्र में कामयाबी नहीं मिली।
मैनपुरी में किशनी तहसील बनी थी और वहां से सपा मुखिया स्वयं प्रत्याशी थे। नई तहसीलों वाले क्षेत्रों में सपा सिर्फ यहीं से लोकसभा का चुनाव जीत पाई।
कुछ प्रस्ताव अभी लटके हैं
शासन में इस समय कुशीनगर जिले के कप्तानगंज व खड्डा तथा उन्नाव के बांगरमऊ को तहसील बनाने का प्रस्ताव है।
शासन ने राजस्व परिषद से इन तहसीलों का प्रस्ताव चुनाव के पहले ही मंगवा लिया था। पर, चुनाव की घोषणा हो गई, ये तहसीलें नहीं बन पाईं।
राजस्व विभाग के अफसर कहते हैं कि जिले व तहसीलों का गठन पूरी तरह से राजनीतिक नजरिए से होता है।
पिछले काफी समय से तहसीलों के मानक मायने नहीं रखते। अब प्रस्तावित तहसीलों पर कब फैसला होगा, कहा नहीं जा सकता।
फैक्ट फाइल
दों साल में बनीं ये नई तहसीलें
श्रावस्ती में जमुनहा, मैनपुरी में किशनी, चित्रकूट में मानिकपुर, इटावा में ताखा, वाराणसी में राजा का तालाब, लखीमपुर खीरी में मितौली, सीतापुर में महोली, बांदा में पैलानी, औरैया में अजीमतल, चित्रकूट में राजापुर, गाजियाबाद में लोनी।
इनके प्रस्ताव पर फैसले का इंतजार
कुशीनगर में कप्तानगंज, कुशीनगर में खड्डा, उन्नाव में बांगरमऊ।