Parliament Winter Session Lok Sabha Rajya Sabha Proceedings LIVE News: संसद के शीतकालीन सत्र का आज आठवां दिन है। आज संसद में चुनाव आयोग द्वारा कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जोरदार बहस हुई। अमर उजाला के इस लाइव ब्लॉग में पढ़ें संसद के दोनों सदनों की कायवाही से जुड़े तमाम अपडेट्स
राहुल जी ने कल कहा था कि सभी संस्थाओं में आरएसएस के लोग रख लिए जाते हैं। क्या इस देश में कोई कानून है कि आरएसएस के लोग संस्थाओं में नहीं आ सकता। इस देश का गृह मंत्री आरएसएस से आया है। हम जनादेश से आए हैं। 1971 का चुनाव हुआ था, इंदिरा जी अपनी ही पार्टी में संघर्ष कर रही थीं। इंदिरा जी ने उस दौरान अपनी पार्टी की तरफ से खड़े किए गए नीलम संजीव रेड्डी की जगह वीवी गिरी को अपना प्रत्याशी बनाया और नेताओं से अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने के लिए कहा। इंदिरा जी ने उस समय कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया और राष्ट्रपति के चुनाव का नतीजा बदल दिया। वामपंथियों ने युवाओं को डायवर्ट करने का काम किया है। 2014 के बाद पीएम मोदी जी ने इसे परिष्कृत किया है। देश के लिए मरना ही आरएसएस की विचारधारा है। देश की संस्कृति का झंडा बुलंद करना ही आरएसएस की विचारधारा है। हम नहीं डरते। मैं 10 साल का था और नारे लगाता था कि असम की गलियां सूनी हैं इंदिरा गांधी खूनी है।
चुनाव आयोग ने कहा कि सीसीटीवी तक सामान्य व्यक्ति की पहुंच होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय जाकर 45 दिन के अंदर सीसीटीवी फुटेज निकलवा सकता है। राजनीतिक दलों को अगर चुनाव प्रक्रिया पर शक है तो वे चैलेंज करें, सीसीटीवी फुटेज हासिल कर सकें। राजनीतिक एजेंट्स भी इसे लेकर याचिका लगा सकते हैं, लेकिन करता कोई नहीं है। आप सिर्फ आरोप लगाते हैं। अब अगर सीसीटीवी फुटेज को लेकर हर कोई सीसीटीवी फुटेज की मांग करेगा तो कैसे चलेगा।
इस देश को, लोकतंत्र को आप धूमिल नहीं कर सकते हैं। ढंग से भाषण तैयार करने सीखने चाहिए। एक उन्होंने कहा कि सीईसी को 2003 में कानून बनाकर इम्युनिटी दी। रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1950 में ही चुनाव आयोग के अधिकारियों को जो कुछ मिला है, उसमें हमने बदलाव नहीं किया है। हमने उसे सिर्फ आगे बढ़ाया है। चुनाव आयोग के कोई भी अधिकारी जिसके आयुक्त भी आते हैं उन पर चुनाव प्रक्रिया के लिए कोई मुकदमा नहीं चल सकता। हमने इसे देश के कानून में संगठित किया है।
मूल मुद्दा है अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची में रखने का। ये 200 बार भी बहिष्कार करेंगे फिर भी हम एक भी घुसपैठिये को वोट नहीं देने देंगे। ढूंढो, डिलीट करो, मतदाता सूची में नाम काटो और डिपोर्ट करो। ये क्यों सदन छोड़कर भाग गए। मैं इनके सामने सिर्फ घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने की बात कर रहा था। ये क्यों सदन से चले गए। जब मैंने नेहरू जी पर, इंदिरा जी पर, इनके पिता जी पर बात की, तब नहीं भागे। घुसपैठियों की बात की तो भाग गए। इन काम है घुसपैठियों को नॉर्मलाइज कर दो, फॉर्मलाइज कर दो।
घुसपैठ हो रही है बांग्लादेश भारत की सीमा से। वहां पर पुल 2216 किलोमीटर का बॉर्डर है। इसमें 1600 किमी से ज्यादा बॉर्डर बन चुका है। 563 किमी का बॉर्डर सिर्फ बंगाल से बच रहा है। असम से लेकर गुजरात तक हमने सारे बॉर्डर बंद कर लिए हैं। मैं कहना चाहता हूं टीएमसी वालों से कि बिहार में घुसपैठिये साफ हो गए। आप घुसपैठियों बचाएंगे तो आपका सफाया भी तय है।
घुसपैठिया सबसे पहले गांव में आता है। पटवारी, मुखिया को पता नहीं चलता। इनका आधार कहां बनता है, वहीं बनता है। बंगाल में इनका आधार बनता है। आप चुनाव तो जीत जाएंगे घुसपैठियों के आधार पर लेकिन देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर रहे हो। खिलवाड़ कर रहे हो।
नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद आज तक कांग्रेस ने चुनाव आयोग को चुनाव सुधार के लिए एक भी सुझाव नहीं भेजा। यह मिलने गए हैं चुनाव आयोग में। चुनाव सुधार जो होता है, वह चुनाव के नियम जो तय होते हैं उसके लिए राजनीतिक दलों को बुलाया जाता है।
कल विपक्ष के नेता ने तीन सवाल पूछे थे और चार सुझाव दिए थे। पहला सवा मैं बताना चाहता हूं कि 73 वर्ष तक देश में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का कोई कानून ही नहीं था। नियुक्ति प्रधानमंत्री सीधे कर देते थे। मैं आज पूरे देश को बताना चाहता हूं कि कुल अब तक जितने चुनाव आयुक्त बने और जितने मुख्य चुनाव आयुक्त हुए। ये सभी इसी प्रकार से आए। 1950 से 1989 तक चुनाव आयोग एक सदस्यीय था। कोई कानून नहीं था। प्रधानमंत्री जी फाइल भेजते थे राष्ट्रपति जी को और वो फाइल अप्रूव हो जाती थी। पूरे 55 साल प्रधानमंत्री जी ने चुनाव आयुक्त को नियुक्त किया। तब कोई सवाल नहीं था। लेकिन पीएम मोदी कुछ करते हैं तो उन पर सवाल। हम तो ऐसा करते भी नहीं हैं।
हमने तो चुनाव आयुक्त के चुनाव के लिए पैनल को बहुसदस्यीय बनाया। कांग्रेस पार्टी ने पुरानी परंपरा बनाई थी। लेकिन अब आरोप लगाया है कि वोट चोरी कर लिया, चुनाव चोरी कर लिया। 1950 से 2023 तक कोई कानून नहीं था और 2023 में एक मुकदमा हुआ। इसमें सुझाव आया कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में पारदर्शिता होनी चाहिए। हमारे सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसमें थोड़ा समय लगेगा। हमें इस पर चर्चा करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक कानून नहीं बनता तब तक चीफ जस्टिस की अध्यक्ष में समिति बने, इसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता हों।
यह कहते हैं कि 2012 में जब सीईसी की नियुक्ति होनी थी तब आडवाणी जी ने पत्र लिखकर कहा था कि एक प्रणाली बनाई जाए, लेकिन कोई प्रणाली नहीं बनी। आप कहते हैं कि वहां (सीईसी) के चुनाव में हमारी बात सिर्फ 33 फीसदी होती है। जनता त करती है कि 66 फीसदी कौन होगा। आप जीतिए और आप भी 66 फीसदी में जगह बनाइए। लेकिन आप तो 100 फीसदी रखकर गए थे उनकी नियुक्ति में। हमने तो इसमें आपको जगह दी। इनका जो भाषण तैयार करते हैं वे रिसर्च नहीं करते।
2014 में हारने की परंपरा शुरू हुई। इस परंपरा के बाद इन्होंने सबसे पहले ईवीएम को निशाना बनाया। ईवीएम इस देश में कौन लेकर आया। 15 मार्च 1989 को जब राजीव गांधी इस देश के प्रधानमंत्री थे, तब ईवीएम लाने का प्रावधान किया गया। इसके बाद ईवीएम के खिलाफ किसी ने याचिका की तो न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने 2002 में उचित ठहराया। राजीव गांधी को भी ये लोग नहीं मानते, सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मानते।
1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में 16 विधानसभा सीटों पर इसका ट्रायल लिया गया। ईवीएम का उपयोग पहली बार 2004 में देश के स्तर पर हुआ। उस चुनाव में कौन जीता? वो जीत गए। उस वक्त ईवीएम की चर्चा बंद। 2009 का चुनाव यह जीत गए, चुप्पी साध ली। 2014 में हम जीते तो कौ, कौ, कौ, कौ, कौ। ये क्या है, जब कानून आप लाए, मशीन आप लाए। आप चुनाव जीते, मौज से देश पर राज किया। तब क्या।
पांच साल रिसर्च के बाद वीवीपैट को लाया गया। चुनाव आयोग ने निर्णय लिया कि पांच प्रतिशत ईवीएम और वीवीपैट के परिणामों की तुलना होगी। मैं आंकड़े लेकर आया हूं चुनाव आयोग से। आज तक 16 हजार वीवीपैट और ईवीएम का मिलान हुआ है। किसी में एक भी वोट की गड़बड़ी नहीं हुई है। इनके बीएलए चुनाव मतगणना में होते हैं और नतीजों पर हस्ताक्षर करते हैं।
2009 में चुनाव आयोग ने ईवीएम को लेकर मौका दिया। कोई छेड़छाड़ नहीं कर पाया। 2017 में भी चुनाव आयोग ने ऐसा ही किया कि कोई छेड़छाड़ कर के दिखाए। ये तो गए नहीं, कोई एक्सपर्ट भी नहीं गया। 2013 में चुनाव आयोग इस निर्णय पर पहुंचा कि सारे चुनाव ईवीएम से ही होंगे।
लेकिन मेरा दिमाग भी चलता है। मैंने भी सोचा कि कुछ गलती नहीं है तो लोग विरोध क्यों करते हैं। तब मुझे ध्यान आया कि यूपी और बिहार में जब इनके जमाने में चुनाव होते थे तब पूरे वोट के बक्से लूट लिए जाते थे। ईवीएम आने के बाद से यह बंद हो गया। चुनाव जीतने का तरीका तब भ्रष्ट तरीका था। लेकिन आज जनादेश से फैसला होता है और ये एक्सपोज हो चुके हैं।
हमारे प्रधानमंत्री जनसंपर्क में आजादी के बाद सबसे ज्यादा प्रवास करने वाली पीएम हैं। मैं जानता हूं नरेंद्र मोदी को। 2001 के बाद से एक भी दिन की छुट्टी नहीं, एक भी दिन का वैकेशन नहीं। सिर्फ जनता के काम में जुटे रहते हैं। कई बार जनता का काम करते हुए इनका (विपक्ष का) बीपी बढ़ जाता है। (विपक्ष पर निशाना साधते हुए)
केस आते हैं तो जज पर आरोप लगा देते हैं, चुनाव आते हैं तो ईवीएम पर आरोप लगा देते हैं। ईवीएम का मामला नहीं चला तो वोट चोरी का मुद्दा ले आए। बिहार में इसका अभियान चलाया, फिर भी बिहार में हार गए। आपकी हार का कारण नीति है, ईवीएम और वोट चोरी नहीं है। भगवान करे कि मैं गलत कर जाऊं, एक दिन कांग्रेस के कार्यकर्ता इनसे जवाब मांगेंगे। इतने साल में नहीं हुआ है कि एक जज कोई जजमेंट दे तो उसके खिलाफ महाभियोग लाते हैं। सभी नेताओं ने साइन भी कर दिया। उद्धव ठाकरे ने भी हस्ताक्षर कर दिया। जजमेंट है कि एक पहाड़ी पर सबसे ऊपर दीया जलाया जाए। एक वर्ग को खुश करने के लिए महाभियोग लेकर आए हैं जज के खिलाफ। देश की जनता इनकी मदद नहीं करेगी।
मई 2014 में मोदीजी देश के प्रधानमंत्री बने। एनडीए तब से तीन लोकसभा चुनाव और 41 विधानसभा चुनाव जीते। यानी कुल 44 चुनाव हमने जीते। उन्होंने भी 30 विधानसभा चुनाव जीते। अगर मतदाता सूची भ्रष्ट है तो क्यों शपथ ली। राहुल गांधी जहां से चुनकर आए थे, वहां की मतदाता सूची में भी गलती के बारे में हमने बताया। चुनाव की मतदाता सूची में जो थोड़ी बहुत गलतियां हैं, उसे ये लोग चुनाव हारने का कारण बताते हैं। फिर भी चलो मान लो कि मतदाता सूची ठीक नहीं है तो गहन पुनरीक्षण सूची का मतलब ही है कि मतदाता सूची ठीक कर रहे हैं।
ममता, स्टालिन, राहुल, अखिलेश और हेमंत सोरेन ने भी चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। इसमें सभी लोग इंडी गठबंधन के हैं। ये एक संवैधानकि प्रक्रिया है। आप लोगों ने पूरी दुनिया में भारत के लोकतंत्र की छवि को धूमिल किया है। मतदाता को मालूम है कि हमने चुना है इसीलिए ये लोग सत्ता में आए हैं। ये एक प्रक्रिया चलने लगी है कि आप जब चुनाव जीतो तो ठीक हार जाओ तो सवाल उठाने लगो। इसके साथ ही कहा कि अगर मतदाता सूची गलत है तो क्यों शपथ ली।
अमित शाह ने यह भी कहा कि विपक्ष के नेता की तीनों प्रेस कॉन्फ्रेंस का जवाब भी दूंगा। एक सादी वाली, एक एटम बम वाली और एक हाइड्रोजन बम वाली। इस पर राहुल गांधी ने उन्हें बीच में टोका। राहुल गांधी ने अमित शाह की बात का जवाब देते हुए कहा कि मैं आपको चैलेंज करता हूं। डिबेट कर लीजिए। आप पहले कॉन्फ्रेंस का जवाब दीजिए। इस पर शाह ने कहा कि आप मेरे बोलने का क्रम तय नहीं करेंगे। मैं अपने भाषण का क्रम अपने हिसाब से तय करूंगा।
अमित शाह ने राहुल गांधी का नाम लेकर कहा कि वह हरियाणा का एक मकान नंबर बताते हुए दावा करते हैं कि इस घर में इतने मतदाता हैं। इस पर उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने वेरिफिकेशन किया तो यह दावा ही गलत था. ये लोग वोट चोरी का फर्जी नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर विपक्ष की ओर से हंगामा हो गया।
शाह ने जवाब देते हुए कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया मतदाता सूची का शुद्धिकरण है। उन्होंने कहा कि मानता हूं कि कुछ दलों को इस देश के लोग वोट देते नहीं हैं और जो वोट देते हैं, इस प्रक्रिया से उनके भी नाम कट जाएंगे। ऐसे में उनसे सहानुभूति भी है। शाह ने आगे यह भी कहा कि 2010 में एक चुनाव आयुक्त ने तय कर दिया था कि किसी का नाम वोटर लिस्ट से नहीं काटा जाएगा।
चुनाव सुधार चर्चा पर जवाब देते हुए शाह ने कहा कि चुनाव के लिए पूरी तरह से चुनाव आयोग जिम्मेदार है। इसकी व्यवस्था तब बनी थी जब हम सरकार या सत्ता में नहीं थे। इस दौरान उन्होंने बताया कि सांसद मनीष तिवारी कह रहे थे कि एसआईआर का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है, तो बताना चाहता हूं कि यह अनुच्छेद 327 में है.
अमित शाह ने कहा कि जैसे ही विपक्ष चुनावी सुधारों पर चर्चा के लिए तैयार हुआ, दो दिनों तक विस्तृत बहस हुई, लेकिन विपक्ष के कई नेता SIR की ही बातें करते रहे। शाह ने कहा कि अगर SIR पर चर्चा होती, तो जवाब उन्हें ही देना पड़ता, जबकि यह जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, जो एक संवैधानिक संस्था है। उन्होंने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने सभी पुरानी SIR रिपोर्टों का गहराई से अध्ययन किया है और विपक्ष द्वारा फैलाई गई गलत जानकारी का तथ्यात्मक जवाब देने के लिए तैयार हैं। शाह ने कहा कि विपक्ष SIR का मुद्दा छेड़कर बहस को भटकाना चाहता था, जबकि सरकार व्यापक चुनावी सुधारों पर सार्थक चर्चा चाहती थी।
लोकसभा में चुनावी सुधारों पर चल रही बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि सरकार ने SIR (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट) पर चर्चा से इनकार क्यों किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने दो दिन तक संसद को चलने नहीं दिया और देश में यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा और एनडीए चर्चा से बच रहे हैं। शाह ने कहा कि भाजपा और एनडीए कभी भी बहस से पीछे नहीं हटे, बल्कि संसद सबसे बड़ा मंच है जहां हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा हो सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विपक्ष जिस SIR पर बहस की मांग कर रहा था, वह चुनाव आयोग का विषय है और उसी को उस पर जवाब देना चाहिए। ऐसे में संसद में उस रिपोर्ट पर बहस का कोई औचित्य नहीं था।
राज्यसभा में विपक्ष का वॉकआउट, भाजपा सांसद ने बिना वजह हटाया फोरेंसिक सवाल
बुधवार को राज्यसभा में कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने वॉकआउट किया, जब भाजपा सांसद अडिया प्रसाद ने गृह मंत्री अमित शाह से पूछे जाने वाले सवाल को बिना किसी स्पष्टीकरण के वापस ले लिया। प्रसाद ने सवाल गृह मंत्री से यह जानने के लिए पूछा था कि क्या सरकार नए अपराध कानूनों के तहत साक्ष्य एकत्र करने के लिए केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं का विस्तार कर रही है और निर्भया फंड के तहत फोरेंसिक क्षमता बढ़ाने और डेटा को इलेक्ट्रॉनिक रूप से व्यवस्थित करने के क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
सवाल स्टार्ड क्वेश्चन के रूप में स्वीकार किया गया था, जिसमें मंत्री को मौखिक उत्तर देना होता है और तुरंत फॉलो-अप सवाल भी पूछे जा सकते हैं। संसद के नियमों के अनुसार सांसद किसी भी सवाल को स्वेच्छा से वापस ले सकता है, लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसका विरोध किया और पूछा कि सवाल क्यों हटाया गया। अध्यक्ष C P राधाकृष्णन ने कहा कि यह सांसद की इच्छा है और विपक्ष के पास इसे रिकॉर्ड में उठाने का अधिकार नहीं है। इसके विरोध में विपक्षी सांसदों ने संसद से वॉकआउट किया।
राज्यसभा में जीरो ऑवर के दौरान माकपा नेता एए रहिम ने बुधवार को इंडिगो एयरलाइन में चल रहे संकट के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यह स्थिति सरकार की निजीकरण और विनियमन में ढील देने वाली नीतियों का नतीजा है, जिससे भारतीय उड्डयन क्षेत्र दो कंपनियों के कब्जे में चला गया है।
रहिम ने बताया कि इंडिगो देश में 65.6% उड़ानें संचालित करती है, जबकि टाटा समूह की एयर इंडिया 25.7% उड़ानें। यानी कुल मिलाकर 90% से ज्यादा बाजार पर सिर्फ दो कंपनियों का नियंत्रण है। उन्होंने कहा कि सरकार ने यह भ्रम फैलाया कि सरकारी कंपनियां अक्षम होती हैं और निजी क्षेत्र सब ठीक कर देगा, लेकिन आज हालत यह है कि सुरक्षा, सेवा और विमान की गुणवत्ता तीनों जगह हालात खराब हैं।
एअर इंडिया पर भी लगाए आरोप
रहिम ने आरोप लगाया कि एअर इंडिया भी इंडिगो संकट का फायदा उठा रही है। उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि सरकार ने 1,500 किमी से ज्यादा दूरी वाली उड़ानों का किराया 18,000 रुपये तक सीमित करने का आदेश दिया है, फिर भी उन्होंने बुधवार सुबह दिल्ली से तिरुवनंतपुरम का इकॉनॉमी टिकट 64,783 रुपये में बिकते देखा। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार का निजी कंपनियों पर क्या नियंत्रण है?
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बुधवार को सदन के सांसदों से कहा कि वे अपने सवाल छोटे और सीधे बिंदु पर रखें, ताकि ज्यादा सवालों का उत्तर दिया जा सके। ये बात उन्होंने तह कही, जब भाजपा सांसद देवुसिंह चौहान सरकार की सफाई और ऊर्जा के प्रति प्रतिबद्धता पर बात कर रहे थे। इस दौरान बिरला ने उन्हें सिर्फ मुख्य बात बताने के लिए बीच में ही रोका।
महाराष्ट्र के विपक्षी सांसदों, जिनमें NCP- SCP की सुप्रिया सुले भी शामिल हैं, ने संसद में नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NMIA) का नाम बदलकर इसे किसान और मजदूर पार्टी के नेता डीबी पाटिल के नाम पर रखने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। सांसदों ने कहा कि यह कदम डीबी पाटिल की योगदान और यादगार को सम्मानित करने के लिए जरूरी है।
भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला करते हुए कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस के 95 हारों के बाद जल्द ही 100 हारों का आंकड़ा पूरा कर लेंगे। उन्होंने कहा कि हर चुनाव के बाद राहुल गांधी को 1-2 विदेशी यात्राओं की जरूरत होती है। शर्मा ने यह भी कहा कि चुनावी सुधारों से ज्यादा कांग्रेस को अपने आप में सुधार की जरूरत है, क्योंकि वह न तो प्रदर्शन कर पा रही है और न ही खुद को बदल पा रही है।
इसके साथ ही इंडिगो संकट पर शर्मा ने कहा कि संबंधित मंत्रालय और डीजीसीए कड़े कदम उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है और एविएशन मंत्रालय इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है।
पश्चिम बंगाल को केंद्र से मिलने वाले फंड में देरी या कटौती के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। सांसदों ने कहा कि राज्य को समय पर वित्तीय सहायता मिलना जरूरी है और केंद्र की इस लापरवाही से विकास योजनाओं पर असर पड़ रहा है। उन्होंने केंद्र से फंड तुरंत जारी करने की मांग की।
समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव बोले- एसआईआर में गड़बड़ियों के असली जिम्मेदार हैं जिले के अधिकारी
आज संसद में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर होने वाले बहस से पहले समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव ने एसआईआर में कथित गड़बड़ियों के लिए जिला अधिकारियों को जिम्मेदारी बताया है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को संचालित करने की जिम्मेदारी कलेक्टर और चुनाव आयोग की है, लेकिन जो असली गड़बड़ियां हो रही हैं, उसके पीछे जिले के स्तर के अधिकारी हैं।
रामगोपाल यादव ने कहा कि मैंने चुनाव आयोग से कहा था कि आप कोई भी आदेश जारी कर सकते हैं, लेकिन अगर लखनऊ में बैठे लोग कलेक्टर से कहते हैं कि वोट काट दो, तो चाहे आप कितनी भी हिदायत दें कि वोट काटे नहीं जाएं, फिर भी वोट काटे जाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि सिर्फ चुनाव आयोग को दोष देना सही नहीं है। असली जिम्मेदार वे लोग हैं जो प्रशासन से जुड़े हैं और अब पार्टी की तरह काम कर रहे हैं। यही लोग वोटों को इधर-उधर मोड़ रहे हैं।