मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्होंने यही जवाब दिया कि हमारी शादी अब खत्म हो चुकी है। उन्होंने इसकी कोई वजह नहीं बताई, ना ही उन्हें इसका कोई पछतावा था। बाद में मुझे उनके दोस्तों के जरिए मालूम चला कि वे अपने साथ काम करने वाली एक महिला के साथ रिलेशनशिप में हैं। उन हालात को बयां करने के लिए 'स्तब्धरह जाना' कोई मुनासिब शब्द नहीं है। मैं अब और जीना नहीं चाहती थी। मैंने खूब सारी दवाईयां एक साथ खाईं। शायद मैं मर जाती, लेकिन जाने कैसे मैं बच गई। मैंने उनके आगे कभी अपनी जिंदगी की कल्पना ही नहीं की थी, मैंने अपनी शादी के आगे कभी कुछ सोचा ही नहीं था। मैं अपने प्यार को किसी दूसरी महिला के साथ नहीं देख सकती थी। मैं इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। मैं अपने जीवनसाथी को दूसरी महिला के साथ बांटने के लिए तैयार नहीं थी।
मैं जलन और दुख से घिरी हुई थी। मैं उस महिला को कोस रही थी, जबकि मैं यह भूल गई थी कि मेरे पति का भी इसमें उतना ही योगदान है। मैं यह भी समझ रही थी कि यह सब कुछ एक पल में नहीं हुआ। बीती कई यादें मेरे दिमाग में चलने लगीं और मैं उन्हें एक-एक कर जोड़ने लगी। मैंने खुद की तरफ देखना शुरू किया और मुझे लगा कि मैं खूबसूरत नहीं हूं, ना ही मैं ज्यादा पैसे कमाती हूं। 'तुम्हें पाना मेरी खुशकिस्मती है', यह बात मेरे लिए बदलकर ऐसी हो गई कि 'तुम्हारा मेरी जिंदगी में आना मेरी बदकिस्मती है'। 'तुम बेहद खूबसूरत हो', यह बदलकर हो गया 'तुम मेरे साथ रहने लायक नहीं हो'। मैं उनकी शहरी गर्लफ्रेंड के सामने किसी गांव की गंवार जैसा महसूस करने लगी।
मेरा प्यार मुझसे दूर हो रहा था
वह मुझे कहते, 'तुम्हें तो अंग्रेजी बोलनी तक नहीं आती, कौन तुम्हें नौकरी पर रखेगा?' मैं ना सिर्फ उनकी नजरों में गिर रही थी बल्कि मैं खुद की नजरों में भी अपने आप को कमतर महसूस करने लगी। मुझे लगने लगा कि मैं उनके लायक हूं ही नहीं। मैं घर का हर एक काम संभालती, बाजार से सामान खरीदने से लेकर घर के बीमार की देखभाल करने तक सभी काम मैं संभालती। उन्होंने मुझे बाहर ले जाना बंद कर दिया, ना किसी पार्टी में ना डिनर में और ना ही किसी सामाजिक समारोह में। जिस इंसान को मैंने सबसे ज्यादा प्यार किया, वहीं मुझे त्याग रहा था, खुद से दूर कर रहा था। धीरे-धीरे, हमारे बीच जो प्रेम था वह खत्म होता चला गया। मुझे इस प्रेम के खत्म होने का एहसास हुआ तो मैंने इसे वापस पाने की कोशिशें करने लगी, लेकिन कामयाब ना हो सकी, और एक रात वह घर से निकल गए।
घर से चले जाने के बाद वह किसी दूसरे घर में रहने लगे और मैंने अपनी बेटी और ससुरालवालों के साथ उसी घर में रहना जारी रखा। ऐसा नहीं है कि मेरे ससुराल वाले मुझे वहां रखना चाहते थे, बस उन्हें एक उम्मीद थी कि शायद मेरे वहां रहने से वह वापिस लौट आएंगे। दरवाजे पर होने वाली हर एक दस्तक पर मैं दौड़कर देखने जाती लेकिन वहां कभी कूरियर वाले का चेहरा या नौकर को पाकर निराश हो जाती। मैंने अपनी पूरी जिंदगी ही उनके आस-पास बुन ली थी, मेरी उम्र इसी में गुजर चुकी थी। यह वक्त एक नई शुरुआत करने का नहीं था। अपने रिश्ते को बचाने के लिए मैंने कई बार सोचा, मैं खुद से लड़ती रहती। मेरी मानसिक हालत को समझने के लिए मेरी बेटी बहुत छोटी थी।
इन सब वजहों से मेरी सेहत बहुत खराब रहने लगी। मैं चाहती थी कि उनके कंधे पर सिर रखकर आराम कर सकूं। मुझे उनकी जरूरत महसूस होती, मैं चाहती कि जो घाव उन्होंने मुझे दिए थे वह उस पर मरहम लगा सकें। उन्होंने कोर्ट में तलाक की अर्जी डाल दी। तमाम मुश्किल हालातों के बीच मैंने वह केस लड़ा। मुझे यह समझने में तीन साल लग गए कि जिस रिश्ते को बचाने की मैं कोशिश कर रही हूं वह तो कब का मर चुका है। मैं उस इंसान के लिए यह सब कर रही हूं जिसका मेरी जिंदगी में कोई अस्तित्व ही नहीं है। अंत में मैं थक गई। मैं थक गई कोर्ट के चक्कर काटते-काटते, वकीलों के सवालों के जवाब देते-देते और कानूनी खर्चों को उठाते-उठाते। आखिरकार मैं आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए तैयार हो गई।
आसान नहीं था सिंगल मदर बनना
मैंने अपनी नई पहचान को स्वीकार कर लिया, 'तलाकशुदा', एक ऐसा उपनाम जिसे हमारे हमारे रूढ़िवादी समाज में इज्जत के साथ नहीं देखा जाता। मैं उस वक्त 39 साल की थी। मेरे लिए सबसे पहली चुनौती एक नया घर खोजने की थी। मुझे कई सवालों का सामना करना पड़ा, जैसे तुम्हारे पति कहां हैं? वे क्या काम करते हैं? मैं इन सवालों के लिए तैयार नहीं थी। मैं दोबारा उन पुरानी कड़वी यादों में नहीं जाना चाहती थी। मेरी दोस्तों ने मुझे इससे बाहर निकलने में मदद की। वह मेरी जिंदगी में किसी फरिश्ते की तरह आईं। उन्होंने मुझे हिम्मत दी और 'सिंगल मदर' बनने के लिए तैयार किया। यह सब इतना आसान नहीं था। मेरे पति ने तलाक लेने के तुरंत बाद अपनी उस सहयोगी के साथ शादी कर ली। मैं जब भी उन्हें साथ देखती, मेरे घाव दोबारा हरे हो जाते।
उसी मुश्किल वक्त में मेरे माता-पिता का निधन भी हो गया। मेरी जिंदगी में सिर्फ दो ही चीज़ें बाकी रह गईं, मेरी नौकरी और मेरी बेटी। मैं अपने करियर पर ध्यान देने लगी और धीरे-धीरे कॉरपोरेट घरानों की सीढ़ियां चढ़ने लगी। मैं पढ़ने और अपने विचारों को ब्लॉग के रूप में लिखने में व्यस्त रहने लगी। मैंने खुद को अपने पसंदीदा शौक यानी 'लेखन' में व्यस्त कर लिया। अपने पति के लिए खाना बनाने की बजाए अब मैं अपने दोस्तों के लिए खाना बनाने लगी। मैं पार्टियां करने लगी, छोटी-छोटी ट्रिप पर जाने लगी और नई यादों को संजोने के लिए तस्वीरें खींचने लगी। अपने पति की कमी को पूरा करने के लिए मैंने वर्चुअल दुनिया यानि सोशल मीडिया पर कई दोस्त बनाने शुरू कर दिए।
इस वर्चुअल दुनिया ने मुझे आभास कराया कि मेरे आसपास का संसार कितना बड़ा है। मेरा अकेलापन फेसबुक पर मेरी पोस्ट पर आने वाले लाइक और कमेंट्स से दूर होने लगा। मैं एक ऐसे संगठन के साथ जुड़ गई जो गरीब-अनाथ बच्चों के लिए काम करता है, इससे मुझे बहुत ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा मिली। मैं एक बार फिर अपनी जिंदगी जीने लगी, मुझे अपनी ताकत का एहसास होने लगा और मैंने अपनी पीएचडी भी पूरा कर ली। जो कुछ भी मेरी जिंदगी से चला गया था, मैं उन तमाम पलों को वापिस हासिल करने लगी। शर्म महसूस करने की जगह, मैंने लोगों से मिलना और शादियों में जाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, मैंने सुंदर साड़ियां पहननी शुरू कर दी।
मैं उन लोगों को सीधा जवाब देना चाहती थी जो यह सोचते थे कि एक अकेली तलाकशुदा महिला को हमेशा दुखी रहना चाहिए। ऐसे लोग मुझे देखकर अपनी आंखें बड़ी कर लिया करते, लेकिन इससे मेरे आंखों की चमक और ज्यादा बढ़ जाती। मैंने अपना खुद का घर बना लिया और ऑफिस ट्रिप पर कई देशों की यात्राएं भी की। चार साल बाद, मुझे एक बड़ा फैसला करना था। एक नई नौकरी के सिलसिले में मुझे अपना शहर छोड़कर दूसरी जगह जाना था। मैंने नए शहर में बसने का फैसला कर लिया। मैंने एक स्वतंत्र महिला के रूप में दोबारा जन्म लिया। आज मुझे किसी के कंधे की जरूरत नहीं। मैं अकेले चल सकती हूं, पूरे आत्मविश्वास के साथ, चाहे अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो!
(यह कहानी दक्षिण भारत में रहने वाली एक महिला की जिंदगी पर आधारित है। महिला के आग्रह पर उनकी पहचान गुप्त रखी गई है)