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#ऑफिस की बातें और लाइफ: उन्होंने खामोशी से एक लिफाफा थमाया और मेरी नौकरी चली गई

ललित फुलारा Published by: ललित फुलारा Updated Tue, 16 Jul 2019 04:22 PM IST
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नौकरी - फोटो : pixabay

कल रात ही मेरी नौकरी छूटी है। छूटी क्या है मालिक ने निकाल दिया। 4,500 रुपए का चेक थमाकर विदा कर दिया। डेढ महीने में ही नौकरी की सारी खुशी निराशा में तब्दील हो गई। 15 दिन की तनख्वाह और अब फिर बेराजगारी। मालिक बोला- 'काम सीखने के बाद वैसे भी आप छोड़ देते। पुराना लड़का गांव से लौट चुका है। आप कहीं और देखिए।' दो-तीन दिन से मालिक लगातार कह रहा था- 'आपका काफी दूर पड़ता है। 9 हजार में से 5 हजार तो किराया लग जाता है। कहीं और देखिए। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊंगा '

इसे भी पढ़ें-#ऑफिस की बातें और लाइफ: मैंने फेयरवेल का केक काटा और दिल की बात कह डाली लेकिन उसने..!



मैं कहां और देखता? बड़ी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली थी। मालिक को क्या पता नौ में से सात हजार भी किराया लगता तो भी मैं नौकरी नहीं छोड़ता। क्योंकि सबसे मुश्किल नौकरी मिलना ही है। काम सीखने के बाद भी यहीं रहता। मेरा ऑफिस चांदनी चौक में एक संकरी गली में था। यह गली कुछ दिन पहले देशभर में काफी चर्चाओं में रही। अखबारों और टेलीविजन पर छाई रही। बाद में इसी गली ने देश में हिंदु-मुस्लिम भाईचारे की मिशाल पेश की और मैंने भी बड़े चाव से यहां भंडारा खाया। डेढ़ महीन में ही मुझे लगाव हो गया था- ऑफिस के उन रास्तों से जिन्हें मैं रोज नापता था। लेकिन कल रात, मुझे कोफ्त हो रही थी उन्हीं गलियों से जब मैं वापस लौट रहा था।
 

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नौकरी - फोटो : pixabay
कल रात ही मेरी नौकरी छूटी है। छूटी क्या है मालिक ने निकाल दिया। 4,500 रुपए का चेक थमाकर विदा कर दिया। डेढ महीने में ही नौकरी की सारी खुशी निराशा में तब्दील हो गई। 15 दिन की तनख्वाह और अब फिर बेराजगारी। मालिक बोला- 'काम सीखने के बाद वैसे भी आप छोड़ देते। पुराना लड़का गांव से लौट चुका है। आप कहीं और देखिए।' दो-तीन दिन से मालिक लगातार कह रहा था- 'आपका काफी दूर पड़ता है। 9 हजार में से 5 हजार तो किराया लग जाता है। कहीं और देखिए। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊंगा '

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मैं कहां और देखता? बड़ी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली थी। मालिक को क्या पता नौ में से सात हजार भी किराया लगता तो भी मैं नौकरी नहीं छोड़ता। क्योंकि सबसे मुश्किल नौकरी मिलना ही है। काम सीखने के बाद भी यहीं रहता। मेरा ऑफिस चांदनी चौक में एक संकरी गली में था। यह गली कुछ दिन पहले देशभर में काफी चर्चाओं में रही। अखबारों और टेलीविजन पर छाई रही। बाद में इसी गली ने देश में हिंदु-मुस्लिम भाईचारे की मिशाल पेश की और मैंने भी बड़े चाव से यहां भंडारा खाया। डेढ़ महीन में ही मुझे लगाव हो गया था- ऑफिस के उन रास्तों से जिन्हें मैं रोज नापता था। लेकिन कल रात, मुझे कोफ्त हो रही थी उन्हीं गलियों से जब मैं वापस लौट रहा था।
 

नौकरी - फोटो : pixabay
नौकरी का छूटना शब्दों में बयां कैसे किया जाए? मैंने होटल मैनेजमेंट किया और यहां मैं अकाउंट का काम कर रहा था। ऑफिस में चार-पांच लोग थे। सभी से अच्छा रिश्ता बन गया था। जून में जब मेरी नौकरी लगी तो मैं बेहद खुश था क्योंकि  रेस्टोरेंट्स में खाने का ट्रायल दे-देकर मैं परेशान हो गया था। हर रोज घर से 50-60 किलोमीटर दूर ट्रायल देने जाओ और उसके बाद भूल जाओ आपको कोई कॉल आएगी। रेस्टोरेंट्स वाले बेहद चालाक होते हैं। ट्रायल के नाम पर पूरा खाना बनवा लेते हैं और उसके बाद वही वाक्य- 'फोन कर बताते हैं।' कम से कम 50 जगह मैं ऐसे ही ट्रायल के नाम पर खाना बना चुका हूं। फोन कहीं से नहीं आता।

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जब भी मुझे कोई नौकरी मिलती है, मैं खुश हो जाता हूं। पांच महीने पुरानी बात है। एक कॉल सेंटर में मेरी नौकरी लगी। फोन पर लोगों से पैसे मांगने थे। कॉल सेंटर वाले खुद को गैर-सरकारी एनजीओ बता रहे थे। 15 दिन काम करने के बाद एक दिन एचआर ने बुलाया और बोला आपको टीम लीडर बना देते हैं। अचानक इतनी कृपा मेरी समझ नहीं आई और मैंने पूछा क्यों? बोले आपका काम अच्छा है। उसके बाद एचआर ने मुझे बताया यह तो समाज सेवा है। यहां पैसे नहीं मिलते। यह सुनते ही मेरा पारा हाय हो गया। पहले 12 हजार रुपए की बात हुई थी और फिर समाजसेवा! मैं जमकर हंगामा करना चाहता था लेकिन मेरी ही तरह एक-दो लोग आए और  बोले- 'भाई कम से कम हमें जो मिल रहा है। उसे मिलने दो।' अपनी जैसी हालत उनकी भी देखकर, खुद से ज्यादा उनपर दया आ गई।

नौकरी - फोटो : pixabay
घर जाकर छानबीन की तो पता चला कि कॉल सेंटर फर्जी था। पांच साल पहले उत्तराखंड से 12वीं पास कर मैं नोएडा आया। यहां एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से होटल मैनेजमेंट किया। लाखों रुपए खर्च हुए। अब वह इंस्टीट्यूट वहां नहीं है जहां था। सुनने में आया कि वह भी फर्जी ही था। इंस्टीट्यूट ने पहले खूब सपने दिखाए- यहां-वहां नौकरी लगा देंगे लेकिन बाद में हाथ खड़े कर लिए। हर कोई बाद में हाथ ही खड़े कर लेता है। क्या नाते, क्या रिश्तेदार? आपको भी ऐसे कई मिल जाएंगे जो जब आपको नौकरी की दरकार नहीं होगी तब नौकरी दिलवाने का पूरा दम ठोकेंगे और जब नौकरी की जरूरत होगी,  वो अपरिचित बन जाएंगे। ऐसे ही अनुभवों से मैं भी गुजर रहा हूं। 

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ऐसा नहीं है कि मेरी नौकरी नहीं लगी। मैंने भी नौ-दस महीने तक एक फाइव स्टार रेस्टोरेंट में अच्छी तनख्वाह पर काम किया। किसी कारणवश छोड़ना पड़ा और तब से मैं बेरोजगार हूं। मेरे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेरोजगारी पर बोलते और लिखते हैं। मैं पढ़ता और सुनता हूं, बस। कल रात जब मेरी आखिरी नौकरी छूटी तो मैंने घर में नहीं बताया। सुबह जब खाना बनकर तैयार हो गया। तब जाकर मैंने घर में 4500 रुपए का चेक थमा दिया जो तस्दीक करता था नौकरी अब नहीं रही। काल्पनिक की जगह आप मेरा वास्तविक नाम लिख सकते हैं।

(ऑफिस और लाइफ सीरीज की यह दूसरी किस्त है। इसमें दीपक ने अपने अनुभवों को हमारे साथ साझा किया है। दीपक नोएडा में रहते हैं।)
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