मैंने मां बनने पर ही जाना कि कोई दर्द, कोई तकलीफ मायने नहीं रखती जब मां 'पैदा' होती है
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पलंग पर बैठने में भी मेरी टांगें कांपने लगतीं और ऐसे में ही मेरे मासिक चक्र का संतुलन भी अचानक बदल गया। दवाओं का असर और शरीर की कमजोरी दोनों ने जोर लगाया और दिक्कतें बढ़ गईं। इस पूरी स्थिति में वो मां ही थी जो मुझे दवाई देने से लेकर अशक्त पड़े मेरे शरीर और मन दोनों को सकारात्मक ऊर्जा से जगाने का काम कर रही थी।
छोटे भाई-बहनों को संभालने, घर के बाकी काम करने और मुझे पूरी तरह सम्भालने तक वो उसी मुस्कुराहट के साथ लगी हुई थी। उनकी नींद, उनकी भूख-प्यास, उनका आराम सब अचानक जैसे हाशिये पर चले गए थे। थोड़ा ठीक होने पर जब मैंने पूछा- मम्मी आपने कैसे सब कर लिया? आपको घृणा नहीं आई? और मां मुस्कुराकर बोलीं-'उसमें घृणा जैसा क्या है? जब तुम मां बनोगी तब जान जाओगी।'
और वाकई ये मैंने मां बनने पर ही जाना कि कोई दर्द, कोई तकलीफ मायने नहीं रखती जब मां 'पैदा' होती है। अपने बच्चे से जुड़ी हर चिंता उसके लिए खुद के दर्द से पहले होती है। वो चौकस रहकर रातें जागती है ताकि उसका बच्चा अच्छी नींद सो सके। ये तमाम चीजें कोई सैक्रिफाइस नहीं होतीं ये मां की भावनाएं होती हैं जो स्त्री के भीतर ही पनपती हैं।
तो इस मदर्स डे अपने मां होने को सेलिब्रेट कीजिये। खुद से वादा कीजिए कि अपना ध्यान रखेंगी, ताकि उनका ध्यान रख सकें जिनको आप इस दुनिया में लाई हैं।