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International Mothers Day 2022: मां तो बस मां ही है...!

Sun, 08 May 2022 05:57 PM IST
संकल्प सिंह स्वाति शैवाल

सार

इसे कुदरत का कमाल कहिए या कोई जादू। बल्कि मां होना जादूगर होने से कहीं ज्यादा ही है। ऐसा लगता है जैसे हर एक चीज के लिए कोई सुपरपावर शरीर मे आ गई हो। ये बात मैं तब भी महसूस करती थी जब खुद बच्ची थी, और अब भी जब खुद मां हूं।
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मां होना जादूगर होने से कहीं ज्यादा ही है - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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मां जन्म से ही मां होती है,

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इससे इतर और कुछ नहीं।
वो मां होने को ही पोसती है,
और मां बनने को ही जीती है।
औरत होना भी उसके लिए,
मां होने के बाद है।
इसलिए औरत होने की कोई भी बाधा,
उसके मां होने के बीच नहीं आती।

इसे कुदरत का कमाल कहिए या कोई जादू। बल्कि मां होना जादूगर होने से कहीं ज्यादा ही है। ऐसा लगता है जैसे हर एक चीज के लिए कोई सुपरपावर शरीर मे आ गई हो। ये बात मैं तब भी महसूस करती थी जब खुद बच्ची थी, और अब भी जब खुद मां हूं।
 
ये प्रेम का एक अलग ही लेवल है जो सिर चढ़कर बोलता रहता है। तमाम दर्द और असहजता न जाने कैसे उड़न छू हो जाते हैं। केवल ये एहसास मन में होता है कि उस नन्हीं सी जान को किसी भी स्तर पर समझौता न करना पड़े। और वो नन्हीं सी जान 50 बरस की होकर भी नन्हीं सी जान ही रहती है। 
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मुझे याद है किशोरावस्था के उस पड़ाव पर जब मैं शरीर और मन दोनों स्तरों पर परिवर्तनों के तूफान से गुजर रही थी। इसी बीच एक दिन तेज बुखार ने मुझे घेरा और पता चला कि मादा एनाफिलीज जी ने मेरे खून की सिप ली थी। मलेरिया के उस बुखार ने मुझे तोड़ दिया। हालात ये थी कि ठीक होने के महीने भर बाद भी मैं अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही थी।

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मैंने मां बनने पर ही जाना कि कोई दर्द, कोई तकलीफ मायने नहीं रखती जब मां 'पैदा' होती है - फोटो : istock
पलंग पर बैठने में भी मेरी टांगें कांपने लगतीं और ऐसे में ही मेरे मासिक चक्र का संतुलन भी अचानक बदल गया। दवाओं का असर और शरीर की कमजोरी दोनों ने जोर लगाया और दिक्कतें बढ़ गईं। इस पूरी स्थिति में वो मां ही थी जो मुझे दवाई देने से लेकर अशक्त पड़े मेरे शरीर और मन दोनों को सकारात्मक ऊर्जा से जगाने का काम कर रही थी।

छोटे भाई-बहनों को संभालने, घर के बाकी काम करने और मुझे पूरी तरह सम्भालने तक वो उसी मुस्कुराहट के साथ लगी हुई थी। उनकी नींद, उनकी भूख-प्यास, उनका आराम सब अचानक जैसे हाशिये पर चले गए थे। थोड़ा ठीक होने पर जब मैंने पूछा- मम्मी आपने कैसे सब कर लिया? आपको घृणा नहीं आई? और मां मुस्कुराकर बोलीं-'उसमें घृणा जैसा क्या है? जब तुम मां बनोगी तब जान जाओगी।'

और वाकई ये मैंने मां बनने पर ही जाना कि कोई दर्द, कोई तकलीफ मायने नहीं रखती जब मां 'पैदा' होती है। अपने बच्चे से जुड़ी हर चिंता उसके लिए खुद के दर्द से पहले होती है। वो चौकस रहकर रातें जागती है ताकि उसका बच्चा अच्छी नींद सो सके। ये तमाम चीजें कोई सैक्रिफाइस नहीं होतीं ये मां की भावनाएं होती हैं जो स्त्री के भीतर ही पनपती हैं।

तो इस मदर्स डे अपने मां होने को सेलिब्रेट कीजिये। खुद से वादा कीजिए कि अपना ध्यान रखेंगी, ताकि उनका ध्यान रख सकें जिनको आप इस दुनिया में लाई हैं।
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