विशेषज्ञों का कहना है कि नौकरीपेशा जीवन में परिवार के साथ समय बिताने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। बच्चों की देखभाल को निजी माना जाता है। जबकि बच्चे देश का भविष्य होते हैं। इनमें से कोई डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, उद्योगपति बनता है तो कोई कुछ और। उनसे सार्वजनिक हितों के काम होते हैं।
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में वर्कलाइफ लॉ सेंटर के निदेशक जोन विलियम्स का कहना है, जब कंपनी बच्चों की देखभाल के लिए छूट देती है, तो वह सामाजिक जिम्मेदारी निभा रही होती है। जब किसी कर्मचारी को परिवार के साथ बिताने का समय दिया जाए तो वह ज्यादा उत्पादक हो सकता है। नैतिकता का भाव भी ज्यादा दिखाई देगा। हरेक कर्मचारी को जीवन में प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार है।
देखभाल कामकाजी अभिभावक के लिए परेशानी
हालत चिकित्सा, सुरक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं से जुड़े अभिभावकों के लिए बच्चों की देखभाल चुनौतीपूर्ण हो गया है। इन माता या पिता में से कोई भी घर पर रुक सकता। अन्य पेशे वालेे अभिभावकों के लिए भी अकेले देखभाल मुश्किल है। यह दोहरी जिम्मेदारी है।
जानकारों का कहना है, वर्कप्लेस पर कर्मचारियों को ज्यादा पेशेवर दिखने के लिए जताना होता है कि या तो उनके बच्चे नहीं है या जिम्मेदारियों का दबाव नहीं हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद पेड लीव, अफोर्डेबल चाइल्ड केयर, व्यावहारिक शिफ्ट, काम के उचित घंटे और वर्क फ्रॉम होम की इजाजत दी जानी चाहिए।