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बस थोड़ा डर और थोड़ी पागलपंती चाहिए!

Mon, 05 Sep 2016 03:28 PM IST
बीबीसी
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पागलपंती - फोटो : BBC
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लोग कहते हैं कि डर के आगे जीत है। मगर हम आपसे कहते हैं कि डर के साथ ही जीत है। चौंकिए नहीं! दिल में डर का होना उतनी बुरी बात नहीं जितना हम सुनते आए हैं। बल्कि डर, हमारी कामयाबी की राह का साथी बन सकता है।
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आप पूछेंगे कि कैसे? तो, चलिए हम बताते हैं।
हमने बडों को अक्सर कहते सुना है कि कोई भी काम करो डंके की चोट पर करो। बिना किसी खौफ या डर के। लेकिन अगर हम आपसे कहें कि आपके दिल में थोडा सा डर रहे, तो भी आप दुनिया से टक्कर लेने में पीछे नहीं रहेंगे, तो क्या आप यकीन करेंगे।

यकीनन आपको ये बात अटपटी लग सकती है। लेकिन ये बात बिल्कुल सही है। अपने विरोधियों से थोडा डरकर रहना और अपने काम के लिए पागलपंती पालना दोनों आगे बढने के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
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कैथरीन अलरिच दुनिया की जानी मानी स्टॉक इमेज कंपनी में काम करती हैं। अपने काम से और तरक्की से वे खुश भी हैं। लेकिन उन पर अपने काम को लेकर एक डर और पागलपन सवार रहता है।
उन्हें इस बात का डर रहता है कि कहीं कस्टमर बेहतर प्रोडक्ट की तलाश में किसी और दुकान पर ना चला जाए।

ऐसा हुआ तो एक कस्टमर उनकी कंपनी के लिए कम हो जाएगा। हो सकता है कैथरीन का ये पागलपन आपको अजीब लगे लेकिन मार्केट में मुकाबले में बने रहने के लिए ये जरूरी है। 

अगर आप कारोबार में टॉप पर बने रहना चाहते हैं तो आपको अपने विरोधियों की हर हरकत पर नजर रखनी ही होगी। अगर आप अपने डर को सही दिशा में तराशते हैं, तो ये डर आगे बढने में आपकी मदद करता है।

 

नैस्डेक के उपाध्यक्ष ब्रूस ऑस्ट कहते हैं

पागलपंती - फोटो : BBC
​दुनिया के दूसरे सबसे बडे शेयर बाजार नैस्डेक के उपाध्यक्ष ब्रूस ऑस्ट कहते हैं कि वो जब भी सीनियर मैनेजमेंट के लोगो के साथ मीटिंग में जाते हैं, तो दिमाग में एक ही बात रखते हैं कि वहां उनसे क्या-क्या सवाल पूछे जा सकते हैं। साथ ही विरोधी कंपनियां उनकी हर मीटिंग के बारे में क्या क्या पता लगा सकती हैं।

अपने विरोधियों को लेकर डर, आशंका और घबराहट आपको नए आइडिया के साथ काम करने में मदद करता है। ऑस्ट कहते हैं कि नैस्डेक अपने कर्मचारियों को नए आइडिया के लिए हौसलाई अफजाई करती है। उन्हें गिफ्ट दिये जाते हैं, और बदले में ऐसे आइडिया मांगे जाते हैं, जिन पर अमल करके मार्केट में अपनी अलग पहचान बनाकर टॉप पर रहा जा सके।

इसमें एक बात का ख्याल रखा जाता है कि जो भी आइडिया दिया जाएगा वो हवा-हवाई न हो, बल्कि उस आइडिया को अमल में कैसे लाया जाएगा इसका पूरा खाका तैयार करके देना होता है। कंपनी के सीनियर कर्मचारी उस पर गौर करते हैं। दूसरे कर्मचारियों की राय भी ली जाती है। फिर वो आइडिया मंजूर होता है। उसके लिए फंड दिया जाता है।

ऑस्ट कहते हैं नैस्डेक का प्राइवेट मार्केट फंड का बिजनेस ऐसे ही आइडिया का नतीजा है। ऐसा नहीं है कि इसके लिए कोई बहुत नया तरीका अपनाया गया था। लेकिन ये इत्मीनान दिलाने के लिए काफी था कि आप मार्केट के साथ मुकाबले में बने हुए हैं।
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बहुत मर्तबा नाकामी का सामना भी होता है

ऑस्ट कहते हैं "ये जरूरी नहीं है कि सभी आइडिया पसंद ही किए जाएं। बहुत मर्तबा नाकामी का सामना भी होता है। लेकिन ये नाकामी भी नई सोच को जन्म देने में मददगार होती है"। ब्रिटिश मैनेजमेंट कंसलटेंट क्रिस एडमंड का कहना है कि अगर एक बार आपने अपने डर और पागलपन को सही दिशा दे दी, तो फिर, कंपनी के दूसरे कर्मचारियों को भी उसके लिए तैयार रहना होगा।

क्रिस कहते है कि अक्सर छोटी कंपनियां ही मार्केट में नए आइडिया और प्रोडक्ट के साथ आती हैं और बडी कंपनियों को मुकाबला देती हैं। इसलिए जरूरी है कि सिर्फ बडी कंपनियों को ही अपनी विरोधी नहीं समझा जाए, बल्कि हर छोटी कंपनी पर भी नजर हो।

एडमंड कहते हैं कि अगर आप सीनियर पोजिशन पर हैं तो आपकी जिम्मेदारी है कि आप अपनी टीम को भी मजबूत बनाएं। फिर अगर आपके ऑफिस में लालफीताशाही का माहौल है तो फिर आपको जोखिम उठाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

​वैसे मुकाबले में बने रहने के लिए जरूरी है कि कंपनी में सीनियर पोजिशन पर उन्हीं लोगों को रखा जाना चाहिए जो तुरंत फैसला लेने की ताकत रखते हों।
नए विचारों का हमेशा स्वागत किया जाना चाहिए। आगे बढने के लिए डर को, पागलपन को पालना जरूरी है। क्योंकि डर के साथ ही जीत है!
 
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