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त्वचा के कैंसर के मरीजों के लिए खुशखबरी

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गंभीर त्वचा कैंसर पर दो अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों के नतीजों को बेहद उत्साहजनक पाया गया है।
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विकसित मेलानोमा के लिए हुए दोनों परीक्षणों का उद्देश्य शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को इस योग्य बनाना था कि वो ट्यूमर की पहचान और निवारण कर सके।

शिकागो में अमरीकन सोसाइटी ऑफ़ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी की कांफ्रेंस में परीक्षण के परिणामों को जारी किया गया।

परीक्षण में इस्तेमाल की गई दवाएं, पेम्ब्रोलाइज़ुमैब और निवोलूमैब जैविक प्रक्रिया के उस रास्ते को बंद कर देती हैं जिसका इस्तेमाल कर के कैंसर प्रतिरोधी तंत्र को गुमराह करता है।

अन्य अंगों तक फैल चुके त्वचा कैंसर, विकसित मेलानोमा, का उपचार काफ़ी मुश्किल होता है।

कुछ साल पहले तक ऐसे मरीज़ औसतन छह महीने ही जीवित रह पाते थे।

जीवन प्रत्याशा में सुधार
पेम्ब्रोलाइज़ुमैब और निवोलूमैब दवाओं का दूसरे प्रकार के कैंसर के लिए भी परीक्षण किया जा रहा है।

पेम्ब्रोलाइज़ुमैब के असर को जानने के लिए 411 मरीजों पर हुए परीक्षण से पता चला है कि 69 प्रतिशत मरीज कम से कम एक वर्ष तक जीवित रहे।

एमके-3475 के नाम से भी जानी जाने वाली यह दवा दूसरे तरह के ऐसे कैंसर मरीज़ों पर भी आजमाई जा रही है, जिनमें प्रतिरक्षा प्रणाली की ओर से होने वाले प्रतिरोध को रोकने के लिए समान प्रक्रिया है।
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रॉयल फ्री लंदन नेशनल हैल्थ सर्विस फाउंडेशन ट्रस्ट के ऑन्कोलॉजिस्ट सलाहकार डॉक्टर डेविड शाओ दोनों प्रकार के कैंसर- मेलानोमा और फेफड़े के कैंसर पर परीक्षण कर रहे हैं।

उन्होंने बताया, ''ऐसा लगता है कि पेम्ब्रोलाइज़ुमैब में कैंसर के इलाज में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की पूरी संभावना मौजूद है।''

उनके मरीज़ों में से एक 64 वर्षीय वावरिक स्टील पिछले अक्टूबर से हर तीसरे हफ़्ते पेम्ब्रोलाइज़ुमैब की ख़ुराक लेते रहे हैं।

उपचार शुरू होने के पहले वो मुश्किल से ही चल पाते थे क्योंकि मेलानोमा उनके एक फेफड़े में फैल गया था और उन्हें सांस लेने में परेशानी होती थी।

वावरिक बताते हैं, ''मैं सिर्फ खड़े होने की कोशिश करता था और दाढ़ी बनाने में ही मैं थक जाता था, लेकिन अब मैं पहले जैसा सामान्य महसूस करता हूं और बागवानी और ख़रीदारी के लिए जा सकता हूं।''
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उनके फेफड़ों के स्कैन से पता चलता है कि तीन ख़ुराक के बाद ही इस दवा ने उनके फेफड़े से कैंसर को पूरी तरह ख़त्म कर दिया।

'मील का पत्थर'
प्रोफ़ेसर जॉन वैगस्टाफ़ का मानना है कि परीक्षण के नतीजे काफी महत्वपूर्ण हैं।

दूसरी दवा निवोलूमैब का परीक्षण प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए बनी एक अन्य लाइसेंस प्राप्त दवा इपीलिमुमैब के साथ किया गया था।

इस मिश्रण के 53 मरीजों पर हुए शुरुआती परीक्षण में पता चला कि एक वर्ष बाद जीवित रहने की दर 85 प्रतिशत और दो वर्ष बाद 79 प्रतिशत रही।

स्वानसी कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रोफ़ेसर जॉन वैगस्टाफ़ इन दोनों दवाओं के बड़े पैमाने पर हुए परीक्षण में शामिल हैं।

प्रोफ़ेसर जॉन वैगस्टाफ़ ने बताया, ''मैं इससे सहमत हूं कि मेलानोमा के इलाज में यह बड़ी कामयाबी है।''

उन्होंने कहा, ''परीक्षण अब भी अनिश्चित है, इसलिए हम नहीं जानते कि मरीज़ों को कौन सा उपचार मिल रहा है, लेकिन हमें कुछ प्रभावी असर देखने को मिले हैं।''

कैंसर रिसर्च यूके के मुख्य चिकित्सक प्रोफ़ेसर पीटर जॉनसन ने कहा, ''यह देखना रोमांचक है कि मेलानोमा से ग्रस्त लोगों के लिए कई इलाज सामने आ रहे हैं।''

दुष्प्रभाव
परीक्षण में इन दवाओं के दुष्प्रभाव का भी पता चला है।

लेकिन डॉक्टर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। जो नतीजे प्रकाशित हुए हैं वे इस रोग के प्राथमिक चरण के हैं।

ब्रिटेन के कई अस्पतालों में अभी तीसरे चरण के कैंसर के रोगियों पर परीक्षण चल रहा है।

एक वर्ष बाद जब इनकी रिपोर्ट आएगी तभी चिकित्सक इस बात का पता लगा सकते हैं कि इससे जीवन रहने की संभावना में कितना सुधार संभव होगा।

सभी दवाओं की तरह ही इन दवाओं के भी दुष्प्रभाव हैं। वावरिक स्टील कहते हैं कि उन्होंने रात में पसीना महसूस किया है और दो बार वो थोड़ी-थोड़ी देर के लिए बेहोश हुए।

लेकिन वो कहते हैं कि कैंसर के सामने ये दुष्प्रभाव मामूली हैं और डॉक्टर इन लक्षणों का इलाज कर रहे हैं।
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