कैंसर पीड़ित मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अब कैंसर के दौरान दिए जाने वाले रेडियोथिरैपी के साइड इफैक्ट्स को रोका जा सकेगा। बनारस हिंदू युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तीन वर्षों के शोध में इसमें सफलता पाई है।
शोध में पाया गया है कि मंगरैल के नियमित इस्तेमाल से रेडियोथिरैपी के दौरान विकिरण (रेडिएशन) से होने वाले साइड इफैक्ट्स कम हो सकते हैं। वैज्ञौनिकों का मानना है कि ऐसे मरीजों के भोजन में मंगरैल को शामिल किया जाए। मंगरैल की निश्चित मात्रा के बिस्कुट तैयार किए जाएं और रेडियोथिरैपी कराने वाले मरीजों को निश्चित समय पर दिए जाएं। मंगरैल को कलौंजी भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम निगेला 'स्टेविया' है।
डिपार्टमेंट ऑफ एटामिक एनर्जी तथा डीआरडीओ ने बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद संकाय के मेडिसिनल केमेस्ट्री विभाग को वर्ष 2009 में रेडिएशन के साइड इफैक्ट्स कम करने के उपाय तलाशने के लिए शोध की जिम्मेदारी सौंपी।
प्रो. यामिनी भूषण त्रिपाठी के नेतृत्व में हुए शोध में चूहों पर इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। सबसे पहले चूहों को रेडिएशन देकर उसका असर देखा गया। बोन मैरो तथा आंत पर सबसे पहले रेडिएशन का असर होता पाया गया। यह पाया गया कि रेडिएशन के चलते जो कोशिकाएं मर जाती हैं उसे मंगरैल के इस्तेमाल से रोका जा सकता है। इसके इस्तेमाल से शुरुआत में ही कोशिकाओं के मरने का सिलसिला रुक गया।
शोधकर्ता प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि 2012 तक चले शोध की रिपोर्ट हाल ही में डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी तथा डीआरडीओ को भेजी गई है। इसमें सिफारिश की गई है कि मंगरैल को भोज्य पदार्थ के रूप में विकसित कर उन रोगियों को दिया जाए जो कैंसर में सेकाई (रेडियोथिरैपी) करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वैसे तो मंगरैल के कई औषधीय गुण भी हैं। जैसे अपच या पेट दर्द तथा सर्दी जुकाम में यह लाभकारी है।