क्या आधुनिक जीवन हमारी सुनने की ताक़त छीन रहा है? इसका जवाब तलाशने के लिए ब्रिटेन के शोधकर्ता एक व्यापक अध्ययन शुरू करने जा रहे हैं।
अपने अध्ययन के दौरान वे लोगों से उनके सुनने की क्षमता की ऑनलाइन जांच करने के लिए कहेंगे।
एक आंकलन के अनुसार ब्रिटेन में छह में से एक वयस्क में सुनने की क्षमता कम पाई गई है।
मगर यह पता नहीं चला है कि इसके पीछे पर्यावरण से जुड़े कौन से कारक जैसे कि एम्प्लीफाइड म्यूज़िक सुनना जिम्मेदार हैं?
पियानो और ग्रामोफ़ोन
मेडिकल रिसर्च काउंसिल चाहती है कि इस सवाल का जवाब देने के लिए युवा और बुज़ुर्ग आगे आएं।
इनकी मदद से शोरगुल के बीच आवाज़ सुनने की हर वॉलंटियर की क्षमता का पता लगाया जाएगा।
कहा जाता है कि इंसान अगर ज्यादा समय तक ऊंचा संगीत सुने, तो बहरा भी हो सकता है।
वैज्ञानिक यह देखना चाहते हैं कि प्रतिभागियों के सुनने की पुरानी आदत और सुनने की मौजूदा ताक़त के बीच क्या कोई संबंध है। अगर हां, तो यह संबंध कैसा है?
पिछले 100 सालों में इलेक्ट्रॉनिक एम्प्लीफ़िकेशन में काफ़ी बदलाव आए हैं। इसने हमारे सुनने के तरीकों पर भी काफ़ी असर डाला है।
पोर्टेबल एमपी-3 प्लेयर ने परिवार में ज़माने से चलाए जा रहे पियानो और ग्रामोफ़ोन की जगह ले ली है।
ईयरफ़ोन भी नुकसानदेह
डिस्को और क्लब में अब लोग बेहद तेज़ संगीत सुनने के आदी होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों को पता है कि संगीत का ऊंचा सुर सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है।
आजकल लोग संगीत सुनने के लिए इयरफोन का नियमित इस्तेमाल करने लगे हैं। इयरफोन पर संगीत तो धीमा होता है, मगर लगातार सुनने की आदत चिंताजनक है।
आजकल लोग तेज़ संगीत सुनने के आदी होते जा रहे हैं।
हियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. माइकल अकेरोड इस प्रोजेक्ट के मुख्य संचालक हैं।
उन्होंने बताया, "संगीत और सुनने की क्षमता से जुड़ा अध्ययन ज्यादातर उन संगीतकारों पर केंद्रित रहा, जो रोज़ ऊंचा संगीत सुनने को मजबूर होते हैं। मगर ऊंचे संगीत का आम लोगों पर क्या असर होता है, इसके बारे में अभी ज़्यादा पता नहीं है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या दोनों के बीच कोई संबंध है?"
बहरे या कम सुनने वालों के लिए काम करने वालों की संस्था 'एक्शन ऑन हियरिंग लॉस' के पॉल ब्रेक्केल ने कहा, "सुनने की क्षमता में हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। आम धारणा के विपरीत कम सुनाई देना केवल बूढ़ों के लिए ही चिंता का विषय नहीं है।"
एक ताजा आंकलन के अनुसार 10 करोड़ लोगों में किसी न किसी रूप में कम सुनने की बीमारी पाई गई है। साल 2031 तक यह आंकड़ा 14।5 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है।