नए शोध के मुताबिक मोटापे से छुटकारा पाने का ख़र्च धूम्रपान या सशस्त्र संघर्ष पर होने वाले खर्च के लगभग बराबर है। इतना ही नहीं मोटापे से निपटना शराब और जलवायु परिवर्तन से निपटने से अधिक ख़र्चीला है।
आर्थिक सलाहकार कंपनी मैकिंज़ी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के शोध में पता चला है कि वार्षिक आर्थिक गतिविधियों का 2.8 प्रतिशत हिस्सा मोटापे से निपटने पर ख़र्च किया जा रहा है।
मेडिकल पत्रिका लैंसेट के मुताबिक 2.1 अरब लोग यानी दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी मोटापे का शिकार हैं। इसमें अमरीका सबसे ज़्यादा प्रभावित देश है जिसके बाद चीन और भारत जैसे देश हैं।
खरबों डॉलर का बोझ
विश्व की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा मोटापे के शिकार है।
शोध के मुताबिक़ मोटापे से छुटकारा पाने के लिए होने वाले ख़र्च को अगर सेहत से जुड़ी देखभाल और अवकाश के दिनों के रूप में आंका जाए तो वार्षिक लागत 20 खरब डॉलर के बराबर आएगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मोटापे से निपटने के लिए भोजन की मात्रा सीमित करना और फास्ट फूड को नए सिरे से तैयार करना, सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान या चर्बीयुक्त भोजन पर टैक्स लगाने जैसे उपायों की तुलना में ज़्यादा कारगर है।