गर्भधारण कैसे होगा आसान?
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फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को लेकर बड़े खुलासे
इस अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की टीम ने साल 1991 से 2018 के बीच हुए 12 लाख से ज्यादा फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि समय के साथ गर्भधारण के लिए किया जाने वाला इलाज कितना बेहतर हुआ और अलग-अलग उम्र में महिलाओं के लिए इसकी सफलता कितनी रही?
पहली नजर में आंकड़े उम्मीद जगाते हैं।
- करीब तीन दशक में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) की कुल सफलता दर लगभग दोगुनी हुई। ये आधुनिक मेडिकल तकनीक गर्भधारण में मदद करती है। इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ और इक्सी जैसे उपाय इसी के अंतर्गत किए जाते हैं।
- साल 1991 में एआरटी की सफलता दर जहां केवल 14.7 फीसदी थी, ये 2018 तक बढ़कर 28.3 फीसदी हो गई। यानी इलाज की तकनीकें बेहतर हुई हैं और कई लोगों के लिए उम्मीद भी बढ़ी है।
लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा उम्र के साथ सामने आता है। जब महिलाओं के अपने खुद के अंडों से इलाज की बात आती है, तो 40 साल की उम्र के बाद सफलता दर तेजी से नीचे जाती दिखाई देती है।
- 43 साल या उससे अधिक उम्र में अपने अंडों से इलाज की सफलता दर 5 फीसदी से भी कम रह गई।
- विशेषज्ञों ने पाया किसी ऐसी स्थिति में डोनर एग्स यानी किसी दूसरी महिला के अंडों से गर्भधारण एक विकल्प हो सकता है। जिसके परिणाम ज्यादा बेहतर देखे गए।
- साल 2018 तक 43-44 साल की महिलाओं में एआरीटी से होने वाले आधे से ज्यादा जन्मों में डोनर एग्स का इस्तेमाल किया गया था।
- 45 से 50 साल की उम्र में यह आंकड़ा 90 फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया।
तो क्या फर्टिलिटी ट्रीटमेंट उम्र की हर सीमा को पार कर सकता है? क्या समस्या महिला की उम्र है या उसके अंडों की उम्र? और आखिर क्यों 40 के बाद अपने अंडों से सफलता इतनी तेजी से कम होती है?
अब सवाल ये है कि क्या महिला की उम्र और अंडे की उम्र अलग-अलग होती है?
महिला की उम्र का मतलब है आपकी असल उम्र (वर्षो में), जबकि अंडे की उम्र का मतलब है आपके बचे हुए अंडों की बायोलॉजिकल उम्र और सेहत (क्वालिटी और संख्या)
- महिला की उम्र: यह वह समय है जितने साल आप जीवित रही हैं। यह आपकी कुल सेहत और बीते हुए समय को बताता है।
- बायोलॉजिकल उम्र (अंडे की उम्र): यह आपके अंडों की असल उम्र है। महिलाओं में जन्म के समय ही सभी अंडे मौजूद होते हैं जो उनके जीवन भर साथ रहते हैं। ये पुरुषों में स्पर्म की तरह नए नहीं बनते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, आपके अंडे भी आपकी उम्र के साथ-साथ बड़े होते जाते हैं और इनकी संख्या भी कम होती जाती है।
जन्म के साथ ही महिलाओं में आ जाते हैं जीवनभर के अंडे
- जन्म के समय लड़कियों में 10 से 20 लाख अंडे होते हैं।
- प्यूबर्टी के समय यह संख्या प्राकृतिक रूप से घटकर लगभग 3 से 5 लाखअंडे रह जाती है।
- 20 से 30 साल की उम्र के बीच अंडों की क्वालिटी सबसे अच्छी होती है और क्रोमोसोम के हिसाब से हेल्दी अंडों का प्रतिशत सबसे ज्यादा होता है।
- 35 साल की उम्र के बाद अंडों की संख्या और क्वालिटी दोनों में तेजी से गिरावट आती है, जिससे जेनेटिक गड़बड़ियों, फर्टिलिटी रेट कम होने और मिसकैरेज (गर्भपात) का जोखिम बढ़ जाता है।
- यह बात खास तौर पर महत्वपूर्ण है कि महिला की उम्र की तुलना में अंडों की उम्र इस तरह के उपचार की सफलता पर ज्यादा असर डालती दिखाई देती है।
- अध्ययन से यह भी पता चलता है कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की तकनीकें पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई हैं, लेकिन वे शरीर की कुछ प्राकृतिक और जैविक सीमाओं को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं।
- उम्र ज्यादा होने से महिला के अपने अंडों से फर्टिलिटी को दोबारा हासिल करने की कोशिश के सफल होने की संभावना कम रहती है।
ऐसे में अधिक उम्र में एआरटी के जरिए गर्भधारण की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए एग डोनेशन और एग फ्रीजिंग महत्वपूर्ण विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
इटली में रिप्रोडक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट की मुख्य शोधकर्ता डॉ. बीट्राइस क्रेस्टानी का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ प्रजनन क्षमता में आने वाली कमी को अब तक अंडाशय (ओवरी) से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है। अगर आप उम्रदराज़ महिला के अंडों की जगह कम उम्र की डोनर के अंडे इस्तेमाल करें, तो प्रजनन क्षमता को काफी हद तक रीसेट किया जा सकता है।
आईवीएफ के लिए किन बातों का रखें ध्यान
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आईवीएफ के अच्छे परिणाम के लिए और क्या चीजें जरूरी?
वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. गरिमा भारती बताती हैं, आईवीएफ हर किसी केस में सफल हो ये जरूरी नहीं है। शरीर की कई स्थितियां ये तय करती हैं कि आईवीएफ का परिणाम कैसा होगा?
- इसमें महिला की उम्र सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इससे भी ज्यादा जरूरी है अंडों की उम्र और इनकी क्वालिटी।
- 35 वर्ष से कम उम्र में आईवीएफ के सफल होने की संभावना अधिक होती है।
- बढ़ती उम्र के साथ अंडाणुओं की गुणवत्ता कम हो सकती है। इससे आईवीएफ में भी दिक्कत आ सकती है।
- इसके अलावा शुक्राणु की गुणवत्ता, गर्भाशय का स्वास्थ्य, हार्मोनल समस्याएं, मोटापा और धूम्रपान जैसी स्थितियां भी आईवीएफ के परिणाम पर असर डाल सकती हैं।
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स्रोत:
Donor egg is the best second choice for many infertile couples: real progress in overcoming age-related fertility is not here yet
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