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प्रेग्नेंसी: 40 की उम्र के बाद आईवीएफ कराने जा रही हैं तो पहले जान लीजिए ये बड़ा सच, पढ़िए रिपोर्ट

Mon, 07 Sep 2026 01:01 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ब्रिटेन की 12 लाख से अधिक एआरटी प्रक्रियाओं पर हुई स्टडी बताती है कि 43 साल या उससे अधिक उम्र में अपने अंडों से आईवीएफ की सफलता 5 फीसदी से कम रहती है। वहीं डोनर एग्स से सफलता एक-तिहाई से अधिक रही। शोधकर्ताओं के अनुसार अंडों की उम्र, महिला की उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
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आईवीएफ के बारे में जानिए - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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क्या आपकी भी उम्र 40 से ज्यादा है और मां बनने की प्लानिंग कर रही हैं? इस आयु वर्ग की महिलाओं में प्रेग्नेंसी की योजना बनाते समय सबसे पहले दिमाग में यही आता है कि क्या ऐसा संभव है? ये सवाल इसलिए क्योंकि कई अध्ययनों से ये साबित हो चुका है कि 40 की उम्र के बाद गर्भवती होना ज्यादा मुश्किल हो जाता है।

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इस उम्र में अंडों की संख्या और गुणवत्ता में प्राकृतिक रूप से कमी आ जाती है, साथ ही स्वास्थ्य और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम भी बढ़ जाता है। ऐसी महिलाओं के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक बेहतर उपाय हो सकता है। पर वही सवाल यहां भी है कि क्या 40 की उम्र के बाद आईवीएफ से सफलता मिल सकती है?

उम्र बढ़ने के साथ गर्भधारण के लिए कौन सी चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं, इसकी सफलता किन बातों पर निर्भर करती है, इन्हीं सब सवालों को समझने के लिए विशेषज्ञों की टीम ने एक अध्ययन किया। करीब तीन दशक यानी 30 साल तक चले इस अध्ययन में शोधकर्ताओं को कई ऐसी बातें पता चलीं जो उम्र बढ़ने के साथ प्रेग्नेंसी प्लान कर रही सभी महिलाओं के लिए जानना बहुत जरूरी है।
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अध्ययन में सामने आया कि आईवीएफ कितना सफल होगा, ये महिला की उम्र से ज्यादा अंडे की उम्र पर निर्भर करता है।  आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं।

गर्भधारण कैसे होगा आसान? - फोटो : adobe stock images
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को लेकर बड़े खुलासे

इस अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की टीम ने साल 1991 से 2018 के बीच हुए 12 लाख से ज्यादा फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि समय के साथ गर्भधारण के लिए किया जाने वाला इलाज  कितना बेहतर हुआ और अलग-अलग उम्र में महिलाओं के लिए इसकी सफलता कितनी रही?

पहली नजर में आंकड़े उम्मीद जगाते हैं।
 
  • करीब तीन दशक में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) की कुल सफलता दर लगभग दोगुनी हुई। ये आधुनिक मेडिकल तकनीक गर्भधारण में मदद करती है। इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ और इक्सी जैसे उपाय इसी के अंतर्गत किए जाते हैं।
  • साल 1991 में एआरटी की सफलता दर जहां केवल 14.7 फीसदी थी, ये 2018 तक बढ़कर 28.3 फीसदी हो गई। यानी इलाज की तकनीकें बेहतर हुई हैं और कई लोगों के लिए उम्मीद भी बढ़ी है।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा उम्र के साथ सामने आता है। जब महिलाओं के अपने खुद के अंडों से इलाज की बात आती है, तो 40 साल की उम्र के बाद सफलता दर तेजी से नीचे जाती दिखाई देती है।
 
  • 43 साल या उससे अधिक उम्र में अपने अंडों से इलाज की सफलता दर 5 फीसदी से भी कम रह गई।
  • विशेषज्ञों ने पाया किसी ऐसी स्थिति में डोनर एग्स यानी किसी दूसरी महिला के अंडों से गर्भधारण एक विकल्प हो सकता है। जिसके परिणाम ज्यादा बेहतर देखे गए।  
  • साल 2018 तक 43-44 साल की महिलाओं में एआरीटी से होने वाले आधे से ज्यादा जन्मों में डोनर एग्स का इस्तेमाल किया गया था।
  • 45 से 50 साल की उम्र में यह आंकड़ा 90 फीसदी से भी ऊपर पहुंच गया।

तो क्या फर्टिलिटी ट्रीटमेंट उम्र की हर सीमा को पार कर सकता है? क्या समस्या महिला की उम्र है या उसके अंडों की उम्र? और आखिर क्यों 40 के बाद अपने अंडों से सफलता इतनी तेजी से कम होती है? 

आईवीएफ से गर्भधारण - फोटो : Adobe Stock
अब सवाल ये है कि क्या महिला की उम्र और अंडे की उम्र अलग-अलग होती है?

महिला की उम्र का मतलब है आपकी असल उम्र (वर्षो में), जबकि अंडे की उम्र का मतलब है आपके बचे हुए अंडों की बायोलॉजिकल उम्र और सेहत (क्वालिटी और संख्या)
 
  • महिला की उम्र: यह वह समय है जितने साल आप जीवित रही हैं। यह आपकी कुल सेहत और बीते हुए समय को बताता है। 
  • बायोलॉजिकल उम्र (अंडे की उम्र): यह आपके अंडों की असल उम्र है। महिलाओं में जन्म के समय ही सभी अंडे मौजूद होते हैं जो उनके जीवन भर साथ रहते हैं। ये पुरुषों में स्पर्म की तरह नए नहीं बनते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, आपके अंडे भी आपकी उम्र के साथ-साथ बड़े होते जाते हैं और इनकी संख्या भी कम होती जाती है।

जन्म के साथ ही महिलाओं में आ जाते हैं जीवनभर के अंडे
 
  • जन्म के समय लड़कियों में 10 से 20 लाख अंडे होते हैं। 
  • प्यूबर्टी के समय यह संख्या प्राकृतिक रूप से घटकर लगभग 3 से 5 लाखअंडे रह जाती है। 
  • 20 से 30 साल की उम्र के बीच अंडों की क्वालिटी सबसे अच्छी होती है और क्रोमोसोम के हिसाब से हेल्दी अंडों का प्रतिशत सबसे ज्यादा होता है। 
  • 35 साल की उम्र के बाद अंडों की संख्या और क्वालिटी दोनों में तेजी से गिरावट आती है, जिससे जेनेटिक गड़बड़ियों, फर्टिलिटी रेट कम होने और मिसकैरेज (गर्भपात) का जोखिम बढ़ जाता है।

आईवीएफ की तकनीक - फोटो : Adobe Stock
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

जर्नल पॉपुलेशन स्टडीज में प्रकाशित
इस अध्ययन की रिपोर्ट में शोधकर्ता कहते हैं, यह देखकर हैरानी हुई कि उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में अपने अंडों से आईवीएफ या इक्सी जैसे उपायों की सफलता दर इतनी कम है, जबकि डोनर एग्स से सफलता दर उम्र बढ़ने के बावजूद काफी स्थिर बनी रहती है।
 
  • यह बात खास तौर पर महत्वपूर्ण है कि महिला की उम्र की तुलना में अंडों की उम्र इस तरह के उपचार की सफलता पर ज्यादा असर डालती दिखाई देती है। 
  • अध्ययन से यह भी पता चलता है कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की तकनीकें पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई हैं, लेकिन वे शरीर की कुछ प्राकृतिक और जैविक सीमाओं को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं।
  • उम्र ज्यादा होने से महिला के अपने अंडों से फर्टिलिटी को दोबारा हासिल करने की कोशिश के सफल होने की संभावना कम रहती है। 

ऐसे में अधिक उम्र में एआरटी के जरिए गर्भधारण की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए एग डोनेशन और एग फ्रीजिंग महत्वपूर्ण विकल्प अपनाए जा सकते हैं।

इटली में रिप्रोडक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट की मुख्य शोधकर्ता डॉ. बीट्राइस क्रेस्टानी का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ प्रजनन क्षमता में आने वाली कमी को अब तक अंडाशय (ओवरी) से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है। अगर आप उम्रदराज़ महिला के अंडों की जगह कम उम्र की डोनर के अंडे इस्तेमाल करें, तो प्रजनन क्षमता को काफी हद तक रीसेट किया जा सकता है।
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आईवीएफ के लिए किन बातों का रखें ध्यान - फोटो : Adobe Stock
आईवीएफ के अच्छे परिणाम के लिए और क्या चीजें जरूरी?
 
वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. गरिमा भारती बताती हैं, आईवीएफ हर किसी केस में सफल हो ये जरूरी नहीं है। शरीर की कई स्थितियां ये तय करती हैं कि आईवीएफ का परिणाम कैसा होगा?
 
  • इसमें महिला की उम्र सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इससे भी ज्यादा जरूरी है अंडों की उम्र और इनकी क्वालिटी।
  • 35 वर्ष से कम उम्र में आईवीएफ के सफल होने की संभावना अधिक होती है।
  • बढ़ती उम्र के साथ अंडाणुओं की गुणवत्ता कम हो सकती है। इससे आईवीएफ में भी दिक्कत आ सकती है।
  • इसके अलावा शुक्राणु की गुणवत्ता, गर्भाशय का स्वास्थ्य, हार्मोनल समस्याएं, मोटापा और धूम्रपान जैसी स्थितियां भी आईवीएफ के परिणाम पर असर डाल सकती हैं।




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स्रोत:
Donor egg is the best second choice for many infertile couples: real progress in overcoming age-related fertility is not here yet


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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