पिछले कुछ सालों में फिटनेस को बेहतर बनाने के तमाम तरीके सामने आए हैं। वैसे ज्यादातर लोग टहलने को कम करके आंकते हैं। जिम, पिलाटिस, क्रॉस-फिट इत्यादि की लोकप्रियता समय के साथ बढ़ी है। इसके लिए मार्केटिंग को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जिसने फिटनेस के वैश्विक मानदंडों को आवश्यक मूल्यों की तरह पेश किया। लेकिन इन वैश्विक मानदंडों के मायने महज फिट रहने तक सीमित नहीं थे। फिटनेस के मामले में अंतराष्ट्रीय प्रवृत्तियों को अपनाने के पीछे कई कारण छिपे हुए हैं, जिन्होंने भारत में भी पैर पसारने की कोशिशें कीं।
भारत की संस्कृति कुछ ऐसी रही है, जिसमें फिटनेस के परंपरागत रूपों को हमेशा ज्यादा महत्व दिया गया है। इनमें योग, दौड़ना और टहलना भारतीय लोगों के पसंदीदा व्यायाम रहे हैं। लेकिन अब व्यायाम के ये परंपरागत तरीके अपनी चमक खो रहे हैं। हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यायाम के ये परंपरागत तौर-तरीके लंबे समय के लिए फायदेमंद होते हैं।
इनमें कोई खास पैसा नहीं लगता और संपूर्ण फिटनेस को बनाए रखने में कई अन्य फायदे होते हैं। आज के दौर में योग और दौड़ना तो फिर भी लोकप्रिय हैं, लेकिन टहलने की महत्ता कम हुई है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्यों पैदल टहलना, दूसरे परंपरागत व्यायामों और हाल ही में लोकप्रिय हुए अंतराष्ट्रीय फिटनेस के रूपों से किसी मायने में कम नहीं है।