जोड़ों और हड्डियों में दर्द, काम करने की क्षमता में असर, नींद संबंधी परेशानियां, पाचन जैसी कई दिक्कतें हैं जो युवाओं को भी होने लगी हैं और ये आम बात है। लेकिन इसे आम बात मानकर आप गलती कर रहे हैं। ऐसी दिक्कतें एक उम्र के बाद बुढ़ापे में लोगों को हुआ करती हैं, जो अब युवाओं को भी होने लगी हैं। हाल ही में बढ़ती उम्र से संबंधित किया गया एक शोध भारतियों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।
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द लांसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, कुछ चुने हुए देशों में सबसे अधिक और सबसे कम उम्र के लोगों के बीच लगभग 30 साल का फासला है। शोधकर्ताओं ने पाया कि औसतन 65 साल के किसी व्यक्ति को होने वाली उम्र संबंधी परेशानियां जापान और स्विट्जरलैंड में रहने वाले 76 साल के किसी व्यक्ति को होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का स्तर समान होता है। साथ ही यह भी पता चला कि भारत में रहने वाले लोगों को सेहत संबंधी यही परेशानियां 60 की उम्र तक आते-आते महसूस होने लगती हैं।
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शोध की मुख्य लेखिका और अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन में शोधार्थी एंजेला वाई चांग ने कहा कि असमान निष्कर्ष यह दिखाते हैं कि लोगों का दीर्घायु होना या तो एक अवसर की तरह हो सकता है या आबादी के समग्र कल्याण के लिये एक खतरा। यह उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं पर निर्भर करता है।
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उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं जल्दी सेवानिवृत्ति, कम कार्यबल और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च का कारण बन सकती हैं। स्वास्थ्य प्रणाली की बेहतरी पर काम करने वाले सरकारी अधिकारियों और अन्य संस्थाओं को यह सोचने की जरूरत है कि लोगों पर उम्र संबंधी नकारात्मक असर कब से दिखना शुरू होता है। अध्ययन में ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अध्ययन आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
अध्ययन में बताया गया कि चीन और भारत जैसे देश उम्र संबंधी बीमारी रैंकिंग में बेहतर कर रहे हैं लेकिन और ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत आयु से संबंधित बोझ दर में 159वें पायदान पर है जबकि आयु से संबंधित बीमारी बोझ दर में 138वां स्थान है।