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अमेरिका में तेजी से फैल रही 'नई बीमारी' क्या है? 400 से ज्यादा लोग हो चुके हैं संक्रमित, जानिए इसके लक्षण और उपाय

Sat, 08 Aug 2020 10:51 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोरोना वायरस ने पहले से ही दुनियाभर के लोगों को परेशान कर रखा है। इसके सबसे ज्यादा केस तो अमेरिका में ही हैं। वहां कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या 50 लाख के पार हो चुकी है जबकि 1.61 लाख से ज्यादा लोग इसकी वजह से मारे जा चुके हैं। अब अमेरिका में ही एक 'नई बीमारी' ने दस्तक दे दी है। यह 'नई बीमारी' अमेरिका के 34 राज्यों तक फैल चुकी है, जहां 400 से ज्यादा लोग इससे संक्रमित होकर बीमार पड़ चुके हैं। अमेरिका की सबसे बड़ी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने इसे लेकर अलर्ट जारी किया है। आइए जानते हैं इस 'नई बीमारी' के बारे में, यह कितनी खतरनाक है और क्या कोरोना वायरस से इसका कोई संबंध है। 
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Salmonella - फोटो : Amar Ujala
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह 'नई बीमारी' लाल और पीले प्याज से फैल रही है। इस वजह से सीडीसी ने लोगों को प्याज खाने को लेकर एहतियात बरतने और सतर्क रहने की चेतावनी दी है। यह 'नई बीमारी' सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि कनाडा में भी फैल रही है। वहां इसकी वजह से 50 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दरअसल, यह 'नई बीमारी' सैल्मोनेला बैक्टीरिया के संक्रमण से फैल रही है। असल में सैल्मोनेला बैक्टीरिया के एक समूह का नाम है। अमेरिका में यह खाद्य जनित बीमारी का एक आम कारण है। यह बैक्टीरिया कच्चे मांस, बीफ, अंडे और कभी-कभी बिना धोए गए फलों और सब्जियों पर भी पाया जाता है। इस बीमारी का कोरोना वायरस से कोई संबंध अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सीडीसी के मुताबिक, इस बैक्टीरिया की खोज वर्ष 1885 में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने की थी, जिसका नाम डॉ. डेनियल एल्मर सैल्मोन था। उन्होंने ही इस बैक्टीरिया को अपना नाम दिया था। 23 जुलाई, 1850 को जन्मे डॉ. सैल्मोन एक पशु रोग विशेषज्ञ थे। 30 अगस्त, 1914 को उनकी मौत हो गई थी। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
संक्रमण के लक्षण क्या हैं? 
  • सैल्मोनेला संक्रमण वाले अधिकांश लोगों को दस्त, बुखार और पेट में ऐंठन होती है। 
  • लक्षण आमतौर पर संक्रमण के छह घंटे से छह दिन बाद और चार से सात दिनों के बीच दिखने शुरू होते हैं। 
  • कुछ लोगों में संक्रमण के बाद कई हफ्तों तक लक्षण दिखते ही नहीं हैं जबकि कुछ लोग कई हफ्तों तक लक्षणों का अनुभव करते हैं।  
  • सैल्मोनेला संक्रमण के तनाव कभी-कभी मूत्र, रक्त, हड्डियों, जोड़ों या तंत्रिका तंत्र (रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क) में संक्रमण का कारण भी बन सकते हैं और गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लोग कैसे संक्रमित होते हैं? 

सैल्मोनेला बैक्टीरिया लोगों और जानवरों की आंतों में रहते हैं। लोग विभिन्न प्रकार के स्रोतों से संक्रमित हो सकते हैं, जैसे कि- 
  • दूषित भोजन खाने या दूषित पानी पीने से 
  • संक्रमित जानवरों या उनके मल को छूने से
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या ये कोई नई बीमारी है? 
  • सैल्मोनेला बैक्टीरिया का संक्रमण कोई बीमारी नहीं है बल्कि अमेरिका में यह बहुत पहले से अस्तित्व में है। सीडीसी का अनुमान है कि सैल्मोनेला हर साल अमेरिका में 10 लाख से ज्यादा बीमारियों का कारण बनता है। इसकी वजह से अमेरिका में हर साल लगभग 420 लोगों की मौत होती है, लेकिन चूंकि लोग पहले से ही कोरोना वायरस जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित नजर आ रहे हैं, ऐसे में इसे फिलहाल नई बीमारी ही माना जा रहा है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या संक्रमण लंबे समय तक परेशानी का कारण बन सकता है? 
  • वैसे तो सैल्मोनेला संक्रमण के कारण होने वाले दस्त वाले अधिकांश लोग पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ लोगों में मल से संबंधित परेशानियां कुछ महीनों तक सामान्य नहीं हो सकती हैं। 
  • सैल्मोनेला संक्रमण वाले कुछ लोगों में जोड़ों में दर्द जैसी परेशानियां होती हैं, जो आगे चलकर प्रतिक्रियाशील गठिया का कारण बन सकती हैं। 
  • प्रतिक्रियाशील गठिया महीनों या सालों तक रह सकता है और इसका इलाज करना मुश्किल हो सकता है। 
  • प्रतिक्रियाशील गठिया वाले कुछ लोगों को पेशाब करते समय आंखों में जलन और दर्द होता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
संक्रमण का इलाज कैसे किया जाता है? 

ज्यादातर लोग एंटीबायोटिक दवाओं के बिना चार से सात दिनों के भीतर सैल्मोनेला संक्रमण से उबर जाते हैं, लेकिन जो लोग इस संक्रमण से बीमार पड़ गए हैं, उन्हें लंबे समय तक अतिरिक्त तरल पदार्थ पीना चाहिए, जब तक दस्त रहता है। इसके लिए एंटीबायोटिक उपचार के लिए सिफारिश तब की जाती है, जब- 
  • मरीज गंभीर रूप से बीमार पड़ा हो 
  • मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो 
  • मरीज पहले से एचआईवी संक्रमित हो या उसका कीमोथेरेपी उपचार चल रहा हो 
  • मरीज की आयु 50 वर्ष से अधिक हो और उसे हृदय रोग जैसी गंभीर समस्याएं हों 
  • मरीज 65 या उससे अधिक उम्र का हो
  • बच्चा नवजात हो (12 महीने से छोटा) 
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