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Coronavirus vaccine: वैक्सीन बनाने में इस नीले खून वाले जीव का हो रहा इस्तेमाल, डायनासोर के जमाने से हैं जिंदा

Fri, 10 Jul 2020 05:11 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हॉर्स शू केकड़ा और उनका खून (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
दुनियाभर में कोरोना वायरस के संक्रमण से करोड़ों लोग जूझ रहे हैं, पांच लाख से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है, लेकिन अब तक इसका वैक्सीन नहीं मिल पाया है। हालांकि इसको लेकर लगातार प्रयास जारी हैं। वैक्सीन बनाने की इस प्रक्रिया में दुर्लभ प्रजाति के एक जीव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है। ये जीव 10 आंखों वाला है जबकि इसका खून नीला होता है। ये अमेरिका और दक्षिण एशिया के समुद्री तटों पर पाए जाते हैं। माना जाता है कि धरती पर इनका अस्तित्व 450 मिलियन यानी 45 करोड़ साल से है यानी डायनासोर के जमाने से। धरती पर आई जिस विनाशकारी आपदा को डायनासोर भी नहीं झेल पाए थे, उन्हें झेलकर ये जीव आज भी धरती पर जीवित हैं। चलिए जान लेते हैं इस जीव के बारे में खास बातें और कोरोना वैक्सीन बनाने में इसकी क्या उपयोगिता है?  
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हॉर्स शू केकड़े का खून - फोटो : Social media
इस दुर्लभ प्रजाति के जीव को हॉर्सशू क्रैब (केकड़ा) के नाम से जाना जाता है। ये अपने नीले खून की वजह से ही दुनियाभर में मशहूर हैं, क्योंकि उसका इस्तेमाल दवाइयों की टेस्टिंग के लिए किया जाता है। अब इसी खून का इस्तेमाल कोरोना की वैक्सीन विकसित करने में भी किया जा रहा है। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
दरअसल, हॉर्सशू क्रैब के नीले खून के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि कहीं दवाइयों में कोई खतरनाक बैक्टीरिया या वायरस तो नहीं है। असल में जो दवाएं विकसित की जाती हैं, उनमें कई बार एंडोटॉक्सिन पाया जाता है, जो वायरस की ऊपरी झिल्ली पर मौजूद रहता है। अगर ऐसे ही बिना जांचे उस दवा को किसी मरीज को दे दिया जाए तो उसके इस्तेमाल से उसे जानलेवा बुखार भी हो सकता है। इसीलिए दवाओं को जांचने में हॉर्सशू क्रैब के खून का उपयोग किया जाता है, क्योंकि खून में पाया जाने वाला एक अर्क एंडोटॉक्सिन मिलने पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है, जिससे वैज्ञानिकों को यह पता चल जाता है कि वो दवा इंसानों को देने लायक नहीं है। 

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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिसर्च के लिए यानी दवाइयों में एंडोटॉक्सिन की खोज के लिए हॉर्सशू क्रैब के खून का इस्तेमाल 1970 से शुरू हुआ। उससे पहले यानी 1940 से लेकर 1970 तक इसके लिए खरगोश का इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा रेयान फेलन और नायरा सिमंस द्वारा 2018 में की गई रिसर्च में बताया गया है। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
हॉर्सशू क्रैब को लिविंग फॉसिल यानी जीवित खनिज और  प्राचीन इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) वाला जीव भी कहा जाता है। आप सोच रहे होंगे कि इसका नाम हॉर्सशू क्रैब क्यों पड़ा, तो आपको बता दें कि यह दिखने में घोड़े के पैरों के खुर की तरह होता है। इसीलिए इसका नाम ऐसा पड़ा। 
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हॉर्स शू केकड़े का खून - फोटो : Social media
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में हर साल लगभग पांच लाख हॉर्सशू क्रैब पकड़कर प्रयोगशालाओं में लाए जाते हैं। फिर मशीनों की मदद से इनका खून निकाला जाता है और लगभग दो दिन बाद उन्हें फिर से समुद्र में छोड़ दिया जाता है, लेकिन इसके नुकसान भी हैं। दरअसल, खून निकालने के बाद लगभग 30 फीसदी केकड़ों की मौत हो जाती है। साथ ही उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे ये जीव धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर जा रहे हैं। 
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हॉर्स शू केकड़े - फोटो : Social media
हॉर्सशू क्रैब की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी अमेरिका की डेलावेयर की खाड़ी में 1990 के दौरान 12 लाख से ज्यादा हॉर्सशू क्रैब पाए जाते थे, लेकिन इनकी संख्या में लगातार गिरावट आती गई और अब वहां इनकी संख्या घटकर 3.30 लाख के आसपास हो गई है। ऐसा नहीं है कि इनका इस्तेमाल सिर्फ दवाइयों की टेस्टिंग के लिए ही किया जाता है बल्कि चीन में लोग इसे खाते भी हैं। इस वजह से वहां के समुद्री तट पर भी इनकी संख्या में काफी गिरावट आई है। 
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हॉर्सशू क्रैब (केकड़े) - फोटो : Social media
वैसे वैज्ञानिक इसके नीले खून के विकल्प की तलाश में भी लगे हुए हैं, लेकिन फिलहाल इसका कोई बेहतर विकल्प नहीं मिल पाया है। साल 2016 में कुछ वैज्ञानिकों ने यह दावा किया था कि इसका विकल्प मिल गया है, लेकिन बाद में एक अमेरिकी कंपनी ने यह कहते हुए इसे नकार दिया कि यह विकल्प उतना कारगर नहीं है जितना हॉर्सशू क्रैब का नीला खून है।
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