ऑनलाइन गेम्स की बढ़ती लत
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जून में ही रिपोर्ट किए गए कई मामले
- हालिया मामला मध्यप्रदेश के इंदौर का है। यहां सातवीं कक्षा के छात्र ने सिर्फ इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि वह गेम में 2800 रुपये हार गया था। उसे डर था कि जब परिजनों को यह बात पता चलेगी तो वह उसे डांटेंगे। खबरों के मुताबिक छात्र ने गेमिंग आईडी से अपनी मां का डेबिड कार्ड लिंक कर रखा था। हारी राशि कार्ड में से ही कटी थी। छात्र ने इस बात का इतना तनाव ले लिया कि उसने घर में फांसी लगा ली। अब उसके परिजन सदमे में है। छात्र अक्सर मोबाइल पर गेम खेलता रहता था।
- जून के शुरुआती हफ्ते में राजस्थान से भी ऐसा मामला सामने आया था, जहां ऑनलाइन गेमिंग की वजह से पति ने पत्नी संग किया सुसाइड कर लिया था। ऑनलाइन गेम की लत में फंसकर कर्जदार बने युवक ने पत्नी के साथ मिलकर जीवन लीला समाप्त कर ली थी। युवक ने सुसाइड करने से पहले अपनी पत्नी की बड़ी बहन को फोन पर बताया था कि ऑनलाइन गेम की वजह से उस पर 4 से 5 लाख रुपये का कर्जा है। ऐसे में अब उसके पास अपने जीवन खत्म करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
- 22 जून के अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिजनौर निवासी एक कारोबारी ने भी ऑनलाइन गेम में रकम गंवाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। कारोबारी ऑनलाइन गेम में एक करोड़ रुपये से ज्यादा रकम हार चुका था। इसे चुकता करने के लिए उसने फरवरी में 20 बीघा जमीन भी बेच दी थी
- ऐसे ही एक अन्य मामले में जून के आखिरी हफ्ते में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक 18 वर्षीय छात्र ने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसे भी ऑनलाइन गेम खेलने की लत थी।
ऑनलाइन गेम्स और इसकी लत
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ऑनलाइन गेम्स की लत और मानसिक स्वास्थ्य पर असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, ऑनलाइन गेम्स खेलने पर दिमाग में डोपामिन नामक रसायन रिलीज होता है, जो अस्थायी आनंद देता है। पर लगातार गेम खेलने से दिमाग इसकी आदत डाल लेता है, और बिना खेले व्यक्ति बेचैन, चिड़चिड़ा महसूस कर सकता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गेमिंग की लत ब्रेन के रिवार्ड सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित करता है। कुछ केस में देखा गया है कि गेम हारने पर या पेरेंट्स द्वारा मोबाइल छीनने पर युवाओं ने खुद को चोट पहुंचाई, यहां तक कि आत्महत्या कर ली।
साल 2023 में एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, भारत में 85 से अधिक आत्महत्या के मामले सीधे तौर पर ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे।
ऑनलाइन गेम्स और इसके दुष्प्रभाव
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क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?
अब सवाल उठता है कि आखिर ऑनलाइन गेम्स की लत का भुगतान लोगों को जान देकर क्यों करनी पड़ रही है?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने अमर उजाला को बताया कि, यह केवल “गेम की लत” का मामला नहीं है बल्कि बच्चों की भावनात्मक परिपक्वता, आत्मसम्मान और पारिवारिक संवाद की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है।
ऑनलाइन बैटल गेम्स न केवल तेजी से डोपामिन बढ़ाते हैं और ब्रेन के रिवार्ड सिस्टम को एक्टिव कर देते हैं बल्कि जीत-हार और रिवॉर्ड को उनकी पहचान और आत्मसम्मान से जोड़ देते हैं। जब कोई बच्चा उसमें पैसे हारता है तो उसे न केवल आर्थिक हानि बल्कि मैं फेल हो गया जैसी तीव्र आत्मग्लानि होती है।
यदि बच्चा आर्थिक हानि के बाद यह सोचकर जान दे कि अब डांट पड़ेगी, मुझे माफ नहीं किया जाएगा तो यह पारिवारिक संवाद की विफलता को दर्शाता है। कम उम्र में आत्महत्या करने वाले बच्चों में अक्सर भावनात्मक लचीलापन नहीं होता। एक छोटी विफलता भी उन्हें असहनीय लगती है। स्कूलों में इमोशनल कोपिंग स्किल्स और डिजिटल हेल्थ की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। अभिभावक, शिक्षक और समाज तीनों को मिलकर इस डिजिटल दौर में बच्चों के भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी।
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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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