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चिंता: ऑनलाइन गेम्स की लत और बढ़ते खुदकुशी के मामले, मनोचिकित्सक से जानिए आखिर क्या है इसके पीछे की वजह?

Sat, 02 Aug 2025 07:57 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हाल के महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ऑनलाइन गेम्स में जीत-हार की सनक कैसे हमारे मानसिक स्वास्थ्य को इस कदर प्रभावित कर देती है कि लोगों के पास आत्महत्या के सिवा कोई अन्य विकल्प समझ नहीं आता?
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ऑनलाइन गेम्स के बढ़ती लत - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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मोबाइल फोन्स के बढ़ते इस्तेमाल और इसके कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्प्रभावों पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, पर अब ये एक नई चुनौती पैदा करता दिख रहा है। हम बात कर रहे हैं ऑनलाइन गेमिंग और इसके कारण बढ़ते आत्महत्या के मामलों की।

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ऑनलाइन गेम्स जैसे पब्जी, फ्री फायर और अन्य बैटल गेम्स अब महज मनोरंजन का जरिया नहीं रहे, बल्कि कई युवाओं के लिए ये जानलेवा लत बन चुके हैं। हाल के वर्षों में ऐसे कई चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं जहां ऑनलाइन गेमिंग की लत ने युवाओं को मानसिक तनाव, आक्रोश और अंत में आत्महत्या तक के रास्ते पर ला खड़ा किया। यह सिर्फ खेल नहीं, एक छुपा हुआ मनोवैज्ञानिक युद्ध साबित हो रहा है, जिसमें हारने वाला अपनी जिंदगी भी दांव पर लगा देता है।

हाल के महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जीत-हार की सनक कैसे हमारे मानसिक स्वास्थ्य को इस कदर प्रभावित कर देती है कि लोगों के पास आत्महत्या के सिवा कोई अन्य विकल्प समझ नहीं आता?

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ऑनलाइन गेम्स की बढ़ती लत - फोटो : Adobe Stock
जून में ही रिपोर्ट किए गए कई मामले
 
  • हालिया मामला मध्यप्रदेश के इंदौर का है। यहां सातवीं कक्षा के छात्र ने सिर्फ इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि वह गेम में 2800 रुपये हार गया था। उसे डर था कि जब परिजनों को यह बात पता चलेगी तो वह उसे डांटेंगे। खबरों के मुताबिक छात्र ने गेमिंग आईडी से अपनी मां का डेबिड कार्ड लिंक कर रखा था। हारी राशि कार्ड में से ही कटी थी। छात्र ने इस बात का इतना तनाव ले लिया कि उसने घर में फांसी लगा ली। अब उसके परिजन सदमे में है। छात्र अक्सर मोबाइल पर गेम खेलता रहता था। 
 
  • जून के शुरुआती हफ्ते में राजस्थान से भी ऐसा मामला सामने आया था, जहां ऑनलाइन गेमिंग की वजह से पति ने पत्नी संग किया सुसाइड कर लिया था। ऑनलाइन गेम की लत में फंसकर कर्जदार बने युवक ने पत्नी के साथ मिलकर जीवन लीला समाप्त कर ली थी। युवक ने सुसाइड करने से पहले अपनी पत्नी की बड़ी बहन को फोन पर बताया था कि ऑनलाइन गेम की वजह से उस पर 4 से 5 लाख रुपये का कर्जा है। ऐसे में अब उसके पास अपने जीवन खत्म करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
 
  • 22 जून के अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिजनौर निवासी एक कारोबारी ने भी ऑनलाइन गेम में रकम गंवाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। कारोबारी ऑनलाइन गेम में एक करोड़ रुपये से ज्यादा रकम हार चुका था। इसे चुकता करने के लिए उसने फरवरी में 20 बीघा जमीन भी बेच दी थी
 
  • ऐसे ही एक अन्य मामले में जून के आखिरी हफ्ते में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक 18 वर्षीय छात्र ने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसे भी ऑनलाइन गेम खेलने की लत थी।

ऑनलाइन गेम्स और इसकी लत - फोटो : Freepik
ऑनलाइन गेम्स की लत और मानसिक स्वास्थ्य पर असर

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, ऑनलाइन गेम्स खेलने पर दिमाग में डोपामिन नामक रसायन रिलीज होता है, जो अस्थायी आनंद देता है। पर लगातार गेम खेलने से दिमाग इसकी आदत डाल लेता है, और बिना खेले व्यक्ति बेचैन, चिड़चिड़ा महसूस कर सकता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गेमिंग  की लत ब्रेन के रिवार्ड सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित करता है। कुछ केस में देखा गया है कि गेम हारने पर या पेरेंट्स द्वारा मोबाइल छीनने पर युवाओं ने खुद को चोट पहुंचाई, यहां तक कि आत्महत्या कर ली।

साल 2023 में एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, भारत में 85 से अधिक आत्महत्या के मामले सीधे तौर पर ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे। 
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ऑनलाइन गेम्स और इसके दुष्प्रभाव - फोटो : Adobe stock
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?

अब सवाल उठता है कि आखिर ऑनलाइन गेम्स की लत का भुगतान लोगों को जान देकर क्यों करनी पड़ रही है?

इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने अमर उजाला को बताया कि, यह केवल “गेम की लत” का मामला नहीं है बल्कि बच्चों की भावनात्मक परिपक्वता, आत्मसम्मान और पारिवारिक संवाद की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है।

ऑनलाइन बैटल गेम्स न केवल तेजी से डोपामिन बढ़ाते हैं और ब्रेन के रिवार्ड सिस्टम को एक्टिव कर देते हैं बल्कि जीत-हार और रिवॉर्ड को उनकी पहचान और आत्मसम्मान से जोड़ देते हैं। जब कोई बच्चा उसमें पैसे हारता है तो उसे न केवल आर्थिक हानि बल्कि मैं फेल हो गया जैसी तीव्र आत्मग्लानि होती है।

यदि बच्चा आर्थिक हानि के बाद यह सोचकर जान दे कि अब डांट पड़ेगी, मुझे माफ नहीं किया जाएगा तो यह पारिवारिक संवाद की विफलता को दर्शाता है। कम उम्र में आत्महत्या करने वाले बच्चों में अक्सर भावनात्मक लचीलापन नहीं होता। एक छोटी विफलता भी उन्हें असहनीय लगती है। स्कूलों में इमोशनल कोपिंग स्किल्स और डिजिटल हेल्थ की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। अभिभावक, शिक्षक और समाज तीनों को मिलकर इस डिजिटल दौर में बच्चों के भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। 



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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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