ग्लूकोज कीटोन इंडेक्स (जीकेआई) टेस्ट
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गौरतलब है कि दुनियाभर में होने वाली हर
10 में से लगभग 7-8 मौतें नॉन कम्युनिकेबल डिजीज के कारण होती हैं। ये बीमारियां एक से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलतीं, बल्कि धीरे-धीरे शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचाती रहती हैं। कैंसर, दिल की बीमारी, डायबिटीज, मोटापा और दिमाग से जुड़ी कई गंभीर बीमारियां इनका उदाहरण हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनका पता अक्सर तब चलता है, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।
ऐसे में अगर कोई आसान, सस्ता और जल्दी होने वाला टेस्ट पहले ही खतरे का संकेत दे दे, तो समय रहते खानपान, लाइफस्टाइल और इलाज के जरिए बीमारी को टालने या उसके असर को कम करने का मौका मिल सकता है। माना जा रहा है कि जीकेआई टेस्ट इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
ग्लूकोज कीटोन इंडेक्स (जीकेआई) टेस्ट बताएगी बीमारियों का खतरा
अध्ययन की रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया कि उंगली में एक छोटी-सी सुई चुभाकर निकाले गए खून की बूंद से किया जाने वाला एक साधारण टेस्ट बीमारियों का पहले ही पता लगाने में बहुत मददगार हो सकती है।
- अगर खून में मौजूद शुगर (ग्लूकोज) और कीटोन का अनुपात देखा जाए, तो इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को आगे चलकर कैंसर, हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे जैसी बीमारियां होने का खतरा कितना है?
- इतना ही नहीं, यह टेस्ट न्यूरोडीजेनेरेटिव यानी उन बीमारियों के जोखिम भी बता सकता है जो धीरे-धीरे दिमाग और नसों को नुकसान पहुंचाती हैं। इससे अल्जाइमर, पार्किंसन, हंटिंगटन डिजीज और मल्टीपल स्क्लेरोसिस (नसों को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी) का भी पता लगाया जा सकता है।
गंभीर रोगों का चलेगा पता
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कैसे काम करती है ये जांच?
मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि दुनियाभर में होने वाली कुल मौतों में लगभग 75% मौतें नॉन कम्युनिकेबल डिजीज की वजह से होती हैं। साल 2050 तक ये बीमारियां दुनिया पर सबसे बड़ा स्वास्थ्य बोझ बन सकती हैं और इनके संक्रामक बीमारियों से भी आगे निकलने का अनुमान है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि शरीर में मौजूद ग्लूकोज और कीटोन के स्तर को मापने वाला ग्लूकोज कीटोन इंडेक्स टेस्ट लोगों में बीमारी का खतरा पहचानने और समय रहते बचाव के उपाय शुरू करने का आसान तरीका बन सकता है।
जब शरीर को ऊर्जा के लिए पर्याप्त कार्बोहाइड्रेट नहीं मिलते, तब शरीर जमा चर्बी फैट को जलाना शुरू करता है। इस प्रक्रिया में लिवर कुछ विशेष रसायन बनाता है जिन्हें कीटोन कहा जाता है। यानी कीटोन इस बात का संकेत हैं कि शरीर ऊर्जा के लिए फैट का इस्तेमाल कर रहा है।
ये टेस्ट ब्लड शुगर और कीटोन के अनुपात का पता लगाता है जिसे ग्लूकोज कीटोन इंडेक्स (जीकेआई) कहा जाता है।
- अगर किसी व्यक्ति का जीकेआई कम आता है, यानी ब्लड शुगर कम और कीटोन ज्यादा हैं, तो यह बेहतर मेटाबॉलिक हेल्थ का संकेत हो सकता है।
- वहीं अगर जीकेआई ज्यादा है, तो इसका मतलब हो सकता है कि शरीर का मेटाबॉलिज्म ठीक तरह से काम नहीं कर रहा और भविष्य में कई बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
पहले हुई कई रिसर्च में यह पाया गया है कि लो ब्लड शुगर और हाई कीटोन कई गंभीर बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती है। इनमें से ज्यादातर बीमारियां मोटापे से जुड़ी होती हैं।
ग्लूकोज कीटोन इंडेक्स (जीकेआई) टेस्ट हो सकता है असरदार
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
कैंसर रिसर्च यूके के अनुसार, ब्रिटेन में मोटापा और अधिक वजन कैंसर का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। पहले स्थान पर धूम्रपान है। वहां हर 20 कैंसर मरीजों में से एक से ज्यादा मामला मोटापे से जुड़ा होता है।
- फ्रंटियर्स इन साइंस जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में अध्ययन के प्रमुख लेखक और जो बोस्टन कॉलेज में जेनेटिक्स के प्रोफेसर थॉमस सेफ्राइड कहते हैं, इन बीमारियों का कारण केवल हमारे जीन नहीं होते। हमारी जीवनशैली भी इन्हें काफी हद तक तय करती है। जीकेआई टेस्ट भविष्य में कैंसर और अन्य क्रॉनिक बीमारियों की रोकथाम और उनके बेहतर प्रबंधन का एक नया रास्ता दिखा सकता है।
- स्टडी की सह-लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर की बायोकेमिस्ट डॉ. इसाबेला कूपर कहती हैं, ये टेस्ट केवल वजन कम होने पर ध्यान देने के बजाय पूरे शरीर की सेहत की तस्वीर दे सकता है। लोगों की जीवनशैली में आए बदलावों को ट्रैक करने और बीमारी के खतरे का आकलन करने में भी मददगार हो सकता है।
एक बूंद खून से खुलेगा सेहत का राज
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कितना असरदार होगा ये टेस्ट?
इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने पहले प्रकाशित सैकड़ों अध्ययनों की समीक्षा की। उनका निष्कर्ष था कि ब्लड शुगर और कीटोन की जांच करना सुरक्षित, सटीक और कम खर्च वाला तरीका है। दरअसल, जीकेआई को शुरुआत में कैंसर मरीजों के लिए बनाया गया था, ताकि यह पता चल सके कि वे कीटोजेनिक डाइट (ऐसी डाइट जिसमें कार्बोहाइड्रेट बहुत कम और फैट ज्यादा होता है) का सही तरीके से पालन कर रहे हैं या नहीं?
- कुछ वैकल्पिक चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना रहा है कि कीटोजेनिक डाइट से ट्यूमर को मिलने वाली ऊर्जा कम हो सकती है, जिससे उसकी वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
फिलहाल शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी बड़े स्तर पर क्लीनिकल ट्रायल की जरूरत है। तभी यह निश्चित रूप से कहा जा सकेगा कि यह टेस्ट कितना उपयोगी साबित हो सकता है?
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स्रोत:
The glucose ketone index: a proposed quantitative biomarker to support cancer and chronic disease prevention and management
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