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Alert: डायबिटीज-मानसिक रोगों का खतरा साथ लेकर तो नहीं पैदा हो रहा आपका बच्चा? पढ़ें आंखें खोलने वाली रिपोर्ट

Tue, 14 Jul 2026 08:21 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्म के समय बच्चे का ज्यादा वजन आगे चलकर मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारी या यहां तक कि कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है। हालिया शोधों ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सिर्फ गर्भवती महिलाओं ही नहीं, बल्कि हर परिवार के लिए जानना जरूरी हैं।
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‘जायंट बेबी’ के बढ़ते मामले - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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क्या आपने भी ये अनुभव किया है कि अब पहले की तुलना में ‘जायंट बेबी’ का जन्म ज्यादा हो रहा है? कम उम्र में ही हृदय रोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामले भी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं? स्वास्थ्य विशेषज्ञ इनमें से ज्यादातर मामलों के लिए गर्भावस्था के दौरान बरती गई लापरवाहियों को बड़ा कारण बताते हैं। 

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विशेषज्ञों की टीम ने पाया कि प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाएं जो कुछ भी खाती-पीती हैं, उसका सीधा असर न सिर्फ गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत, बल्कि उसके भविष्य पर भी पड़ता है। हालिया शोधों ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सिर्फ गर्भवती महिलाओं ही नहीं, बल्कि हर परिवार के लिए जानना जरूरी हैं। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने ये भी बताया था कि किस तरह से  मां की गलती बच्चों के दिमागी विकास को कर एडीएचडी का शिकार बना सकती है।
 

  • एक ओर वैज्ञानिकों ने पाया है कि जिन लोगों का जन्म उस दौर में हुआ था, जब चीनी पर सरकारी पाबंदी थी और उसका सेवन सीमित था, उनमें जीवन के बाद के वर्षों में चिंता-डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा कम देखा गया।
  • दूसरी ओर एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि गर्भावस्था के दौरान मां में मोटापा, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर लेवल बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकता है। इस वजह से न सिर्फ जन्म के समय बच्चों का वजन अधिक देखा जा रहा है, बल्कि इससे आगे चलकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और कुछ मामलों में कैंसर तक के बढ़ने का खतरा हो सकता है।

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मसलन अगर प्रेग्नेंसी के दौरान मां अपनी सेहत और खान-पान को लेकर अलर्ट रहे तो इससे बच्चों को भविष्य में कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से सुरक्षित किया जा सकता है।

जन्म के समय नवजात का अधिक वजन खतरनाक - फोटो : Freepik.com
'जायंट बेबी' के बढ़ते मामले चिंता का कारण

गोल-मटोल बच्चे देखने में तो हम सभी को प्यारे लगते हैं, पर क्या ये उनकी खुद की सेहत के लिए अच्छा है?

हालिया रिपोर्ट्स पर गौर करें तो पता चलता है कि दुनियाभर में अब पहले की तुलना में ज्यादा 'जायंट बेबी' जन्म ले रहे हैं।
 
  • जायंट बेबी का मतलब है जन्म के समय बच्चे का बढ़ा हुआ वजन।
  • सामान्य तौर पर जन्म के समय बच्चे का वजन 2.5 से 4 किलो को सामान्य माना जाता है।
  • जायंट बेबी का मतलब है 4.5 किलो से अधिक वजन के साथ पैदा होने वाले बच्चे।

अमेरिका के येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों का जन्म के समय वजन ज्यादा था, उनमें 50 साल की उम्र से पहले बाउल कैंसर (आंतों का कैंसर) होने का खतरा बढ़ा हुआ दिखाई दिया। इससे पहले के भी कई अध्ययन अलर्ट करते रहे हैं कि ऐसे बच्चों में आगे चलकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग होने का खतरा भी अधिक देखा जाता रहा है।


ये भी पढ़िए- ( गर्भ में ही तय हो जाता है बच्चे को कैंसर-एडीएचडी जैसी बीमारियां होंगी या नहीं? पर कैसे, समझिए)

गर्भावस्था और बच्चे की सेहत पर असर - फोटो : Freepik.com
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती बीमारियों के खतरे की वजह सिर्फ बच्चे का अधिक वजन और बड़ा आकार ही नहीं है। असली कारण उस माहौल माना जाता है जिसमें बच्चा गर्भ के अंदर विकसित होता है। गर्भावस्था के दौरान मिलने वाले पोषण, हार्मोन और शरीर की परिस्थितियां बच्चे के शरीर की कोशिकाओं और मेटाबॉलिज्म पर लंबे समय तक असर डाल सकती हैं।

लंदन के किंग्स कॉलेज में पोषण विज्ञान की विशेषज्ञ डॉ. कैथरीन डेलरिम्पल कहती हैं कि जन्म के समय बच्चे का अधिक वजन, गर्भ के अंदर के रहे माहौल को दिखाता है। गर्भधारण से पहले के कुछ महीनों से लेकर पूरी गर्भावस्था तक जो कुछ भी होता है, उसका असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।
 
  • जन्म के समय 4 किलोग्राम या उससे अधिक वजन वाले बच्चे को मेडिकल भाषा में फीटल मैक्रोसोमिया कहा जाता है।
  • विशेषज्ञ इसके लिए दो कारण को जिम्मेदार बताते हैं- मां में मोटापा और गर्भावधि के दौरान डायबिटीज।

कैसे पड़ता है बच्चे पर असर?

विशेषज्ञों ने पाया कि जब मां के खून में ज्यादा ग्लूकोज होता है तो उसका कुछ हिस्सा प्लेसेंटा के माध्यम से बच्चे तक पहुंच जाता है।

इससे बच्चे का शरीर ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। इंसुलिन केवल शुगर नियंत्रित नहीं करता, बल्कि एक ग्रोथ हार्मोन की तरह भी काम करता है, जिससे बच्चे की तेजी से बढ़ोतरी और शरीर में चर्बी जमा होने लगती है।

डॉ. डेलरिम्पल कहती हैं, यदि गर्भावधि मधुमेह को सही तरीके से नियंत्रित नहीं किया जाए तो ज्यादा शुगर बच्चे तक पहुंचती रहती है। इससे बच्चे का विकास प्रभावित हो सकता है, उसका वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है और भविष्य में मोटापे का खतरा भी बढ़ सकता है।

यदि किसी महिला को गर्भावधि मधुमेह का पता चलता है, तो डॉक्टर की सलाह का पूरी तरह पालन करना चाहिए ताकि स्थिति को सही तरीके से नियंत्रित किया जा सके।
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गर्भावस्था में ज्यादा चीनी खाना नुकसानदायक - फोटो : Freepik.com
प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा चीनी खाना बच्चे में बढ़ाता है मेंटल हेल्थ का खतरा

एक अन्य  रिपोर्ट में पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान ज्यादा चीनी खाना, बच्चे में भविष्य में मानसिक रोगों का शिकार बना सकती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गर्भवती महिलाओं को चीनी  का सेवन सीमित रखना चाहिए। ऐसा करने से उनके बच्चों की भविष्य की मानसिक सेहत बेहतर रह सकती है।
 
  • अध्ययन में पाया गया कि बेबी बूमर (यानी 1946 से 1964 के बीच जन्मे लोग) में एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती हैं। इसकी एक बड़ी वजह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पैदा हुई स्थितियां और लंबे समय तक चीनी पर लगी सरकारी पाबंदी मानी गई है।
  • शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन बच्चों का गर्भधारण 1953 में चीनी पर लगी पाबंदी हटने से पहले हुआ था, उनमें आगे चलकर चिंता और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों का पता चलने का खतरा 25 प्रतिशत तक कम था।

जर्नल साइकेट्री में प्रकाशित नतीजे हाल के उन शोधों का भी समर्थन करते हैं, जिनमें यह संकेत मिला है कि गर्भावस्था के दौरान ज्यादा चीनी खाने से बच्चे के मस्तिष्क के विकास (ब्रेन डेवलपमेंट) पर असर पड़ सकता है।

गर्भधारण के समय से लेकर बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिन बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है।  शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि भविष्य में बनने वाली पब्लिक हेल्थ से जुड़ी गाइडलाइन और सरकारी नीतियों में गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए चीनी कम खाने की सिफारिश को शामिल करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।



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स्रोत:
Fetal Origins of Mental Health: The Developmental Origins of Health and Disease Hypothesis


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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