फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या शरीर में एंटीबॉडी बन जाने से कोरोना का संक्रमण नहीं होगा? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

Sat, 22 Aug 2020 11:05 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत में कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 29 लाख के पार पहुंच गई है। कोरोना वायरस संक्रमण के लिहाज से भारत दुनिया का तीसरा सबसे अधिक प्रभावित देश है। एक ओर जहां देश में संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं भारत में इलाज के बाद ठीक होने वालों की संख्या भी काफी है। राजधानी दिल्ली में दूसरे सीरो सर्वे की रिपोर्ट जारी की गई है। गुरुवार को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने दूसरी सीरो सर्वे की रिपोर्ट जारी की।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, 29 फीसदी दिल्लीवासियों के शरीर में कोरोना वायरस के एंटीबॉडी मिले हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इन लोगों को कोरोना संक्रमण हो चुका है और उनके शरीर ने उसके खिलाफ एंटीबॉडी विकसित कर ली है। गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने बताया कि दिल्ली में एक से सात अगस्त तक सीरो सर्वे के लिए सैंपल लिए गए थे। इसमें 29.1 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी पाई गई है। यह दूसरे सीरो सर्वे की रिपोर्ट है। 
विज्ञापन

2 of 11
coronavirus in india - फोटो : पीटीआई
पहला सीरो सर्वे जुलाई में किया गया था, जिसमें पाया गया था कि एक-चौथाई से ज्यादा दिल्लीवासी संक्रमित हो चुके हैं। इस सर्वे के लिए 21,387 सैंपल लिए गए थे, जिसमें 23.48 फीसदी लोगों में विकसित एंटीबॉडी पाई गई थी। लेकिन इस बार यह सैंपल साइज 15 हजार लोगों तक ही सीमित था। दूसरे सर्वे में 32.2 फीसदी महिलाओं में और 28 फीसदी पुरुषों में विकसित एंटीबॉडी मिली। इसका एक सीधा मतलब ये भी है कि दो करोड़ की आबादी वाली राजधानी में करीब साठ लाख लोग संक्रमण के बाद ठीक हो चुके हैं। 

हालांकि दिल्ली अभी भी हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने से दूर है। सत्येंद्र जैन ने कहा कि जब किसी जगह पर 40 से लेकर 70 फीसदी लोग एंटीबॉडी विकसित कर लेते हैं तो वहां हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो जाती है। सीरो सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई और पुणे में भी 40 प्रतिशत के करीब लोगों में विकसित एंटीबॉडी मिली है। 
विज्ञापन

3 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन क्या एंटीबॉडी विकसित हो जाने से दोबारा संक्रमण नहीं होगा?

आईसीएमआर में एपिडेमियोलॉजी एंड कम्यूनिकेबल डिजीज डिपार्टमेंट में डॉ. निवेदिता गुप्ता कहती हैं, 'इस बात के अभी बहुत अधिक प्रमाण तो नहीं हैं कि दोबारा संक्रमित हो सकते हैं या नहीं, लेकिन इससे जो स्पष्ट तौर पर बात सामने आती है वो यह कि ये लोग एक बार संक्रमित हो चुके हैं और उन्होंने एक इम्यून विकसित कर लिया है।' 

वो कहती हैं, 'हम उम्मीद तो कर रहे हैं कि वे आने वाले कुछ समय तो सुरक्षित रहेंगे, लेकिन दोबारा संक्रमित हो सकते हैं या नहीं, दुनियाभर में इससे जुड़े बेहद कम प्रमाण हैं। ऐसे में प्रमाणिक तौर पर कुछ भी कहा नहीं जा सकता।' सीरो सर्वे से जो नतीजे आए हैं 'उससे सिर्फ ये पता चल रहा है कि वे संक्रमित हुए थे और अभी ठीक हो चुके हैं।' 

4 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पीएमएसएफ (प्रोग्रेसिव मेडिकोज एंड साइंटिस्ट फोरम) के नेशनल प्रेसिडेंट डॉ. हरजीत सिंह भट्टी कहते हैं कि पहले तो ये समझना जरूरी है कि संक्रमण है क्या? वो कहते हैं, 'संक्रमण का मतलब है कि शरीर के भीतर किसी ऐसे रोगवाहक या बाहरी तत्व का प्रवेश जो शरीर के अंगों और शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में जब आपने उसका प्रोटेक्शन मैकेनिज्म विकसित कर लिया है तो वो शरीर को नुकसान नहीं करेगा।'

हरजीत सिंह कहते हैं, 'जिन लोगों के शरीर में एंटीबॉडी विकसित हो चुकी है, उन्हें संक्रमण होगा ही नहीं, क्योंकि उनके शरीर में पहले से एंटीबॉडी बनी हुई है और ऐसे में हमला होते ही प्रोटेक्टिव मैकेनिज्म एक्टिवेट हो जाएगा और वह तुरंत उसके प्रवेश को रोक देगा।' 
विज्ञापन

5 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया के 180 से अधिक देशों में अपने पैर पसार चुके कोरोना वारस के बारे में अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार ये वायरस तेजी से अपना स्वरूप बदलता है यानी म्यूटेट होता है। तो क्या अगर कोरोना म्यूटेट होकर अपना रूप बदल ले, तब भी यह एंटीबॉडी इंसान की रक्षा करने में सक्षम होंगे? इस सवाल के जवाब में डॉ. निवेदिता कहती हैं कि अभी तो कोरोना वायरस कितना अधिक म्यूटेट हो रहा है, इस बात के भी पूरे प्रमाण नहीं हैं। 
विज्ञापन

6 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉ. हरजीत के मुताबिक, कोविड-19 एक बिल्कुल नया वायरस है। इसके बारे में अभी इस बात की बहुत जानकारी नहीं है कि इसमें री-इंफेक्शन हो रहा है या नहीं हो रहा, इस पर अभी शोध हो रहे हैं। वो कहते हैं, 'यह वायरस किस दर से म्यूटेट हो रहा है इस पर अभी शोध चल रहे हैं, लेकिन म्यूटेशन वाला खतरा तो हमेशा ही रहता है। जैसे इंफ्लुएंजा के वायरस की स्ट्रेन हर साल बदल जाती है और हर साल न्यू स्ट्रेन लोगों को संक्रमित करती है। ऐसे में इसकी वैक्सीन सिर्फ एक साल के लिए काम करती है, लेकिन कोरोना में अब तक सिर्फ चार बार ही हुआ है जब जानवरों से म्यूटेट होकर वायरस इंसानों में आया है। वरना इसमें म्यूटेशन इतना ज्यादा नहीं है। फिलहाल तो इसमें इस तरह का कोई म्यूटेशन नहीं देखा गया है। अभी तो वही वायरस खतरा बना हुआ है।'  
विज्ञापन

7 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
इससे पूर्व क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर में वायरोलॉजी से रिटायर प्रोफेसर डॉ. टी. जैकब ने पहले सीरो सर्वे के नतीजे आने पर कहा था कि सीरो सर्वे के नतीजे खुशखबरी तो नहीं हैं, लेकिन राहत की बात जरूर हैं। उन्होंने कहा था, 'ये नतीजे बताते हैं कि कोरोना वायरस उसी तरह से काम कर रहा है जैसा हमें अब तक इसके बारे में पता है। अभी तक इसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है।' 

8 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
तो क्या कोरोना का पीक आकर जा चुका है?

दिल्ली में कोरोना वायरस का एक पीक आकर जा चुका है- ये बात एम्स के डॉ. रणदीप गुलेरिया कह चुके हैं। नतीजे समझने के लिहाज से ये काफी महत्वपूर्ण होता है कि सर्वे संक्रमण फैलने के किस स्तर पर कराया गया है। अगर सर्वे संक्रमण के शुरुआती समय में कराया जाता है तो नतीजों से बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती। 

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को पांच महीने से अधिक समय हो चुका है और देश में कोरोना वायरस संक्रमण के 29 लाख से अधिक मामले हैं। भारत, दुनिया का तीसरा सबसे अधिक प्रभावित देश है। दिल्ली में पहला सीरो सर्वे 27 जून से 10 के बीच कराया गया। दूसरा सीरो सर्वे एक अगस्त से सात अगस्त के बीच कराया गया। अब तीसरा सीरो सर्वे सितंबर के पहले सप्ताह में किया जाएगा। 

9 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जिनमें एंटीबॉडी विकसित हो गई है तो क्या वे प्लाज्मा डोनेट कर सकते हैं

सभी जानकार मानते हैं कि इस सर्वे के नतीजे इस बात का सबूत नहीं है कि जिन लोगों में एंटीबॉडी मिले हैं वो प्लाज्मा डोनेट कर सकते हैं। दरअसल इसके लिए अलग टेस्ट करने होंगे। आम तौर पर माना जाता है कि मॉडरेट या सिवियर कोरोना मरीज ही प्लाज्मा डोनेट कर सकते हैं। डॉ. हरजीत सिंह कहते हैं, 'हर व्यक्ति के शरीर की अपनी मेमोरी होती है। लर्निंग होती है कि किस वायरस से किस तरह लड़ना है और हर बॉडी का अलग तरीका होता है कि वो कैसे रेस्पॉन्स करे। तो यह जरूरी नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति के अंदर कोई सेल अच्छे से काम कर रही हैं तो वो ही सेल दूसरे में भी अच्छे से काम करें।' 

10 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
क्या है सीरोलॉजिकल टेस्ट?

सीरोलॉजिकल टेस्ट दरअसल एक तरीके का ब्लड टेस्ट है जो व्यक्ति के खून में मौजूद एंटीबॉडी की पहचान करता है। ब्लड में से अगर रेड ब्लड सेल को निकाल दिया जाए, तो जो पीला पदार्थ बचता है उसे सीरम कहते हैं। इस सीरम में मौजूद एंटीबॉडीज से अलग-अलग बीमारियों की पहचान के लिए अलग-अलग तरह के सीरोलॉजिकल टेस्ट किए जाते हैं। 

बावजूद इसके, सभी तरह के सीरोलॉजिकल टेस्ट में एक बात कॉमन होती है और वो ये है कि ये सभी इम्यून सिस्टम द्वारा बनाए गए प्रोटीन पर फोकस करते हैं। शरीर का यह इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बाहरी तत्वों द्वारा शरीर पर किए जा रहे आक्रमण को रोक कर आपको बीमार पड़ने से बचाता है। 
विज्ञापन

11 of 11
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
इस टेस्ट से हासिल क्या होगा?

ऐसे टेस्ट की जरूरत इसलिए है ताकि कंटेनमेंट प्लान में बदलाव की कोई गुंजाइश हो या फिर सरकार को अपनी टेस्टिंग की रणनीति में कोई बदलाव लाना हो तो तुंरत किया जा सके। कुल मिला कर कोरोना के फैलने से रोकने के लिए ये टेस्ट जरूरी हैं। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें