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तितली सी ज़िन्दगी

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इक तितली सी फड़फड़ाती ज़िन्दगी
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कभी हंसती कभी रुलाती ज़िन्दगी

कभी ढूंढें खुशियों के पल
कभी गम में गोते लगाती ज़िन्दगी

कभी देती ठोकरें हज़ार हमें
कभी सहारा दिलाती ज़िन्दगी

कभी सोने न दे ये हमें
कभी सुकून से सुलाती ज़िन्दगी

अब तू ही बता कितने रंग है तेरे
न जाने कितने रंग दिखाती ज़िन्दगी।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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