आरंभ में ही अंत छुपा है, ये पहचान न पाई मैं।
हर पल सोचूं, नव पल जी लूं ,पल-पल करके हर पल खोती आयी मैं।
बचपन सींचा सपन पिरोये,आया यौवन सपन न सोये।
बड़े हुए परिवार बनाया, एक छोटा सा संसार बनाया।
छटपटाए मन संकुचाए मन, कभी मिले वो पल मैं जी लूं, जिसमें छुटे हर इक पल को।
सी लूं जख्म वो खुले पड़े जो। कसक है दिल में आहत है मन, क्यूँ आयी मैं इस जीवन में।
मृत्यु सरल है जीवन कठिन है, चक्र ये ऐसा जहाँ शुरू है वही ख़त्म है, यही समझ नहीं पाई मैं।
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