यादों की गुल्लक में हर रोज सिक्के डालता हूँ ,
ये मानता हूँ,
जब आएगा बुढ़ापा गुजारा इन्ही से होगा
पैसे कम कमाता हूँ, दोस्त ज्यादा बनाता हूँ ,
ये मानता हूँ ,
जब आएगी मुसीबत सहारा इन्हीं से होगा
सब कहते हैं बेअसूल हूँ, खोटा हूँ, फिजूल हूँ, फूल नही शूल हूँ
महफिलो का शौक नहीं मुझे, तन्हाई में जीना जानता हूँ,
ये मानता हूँ,
जब हो जाऊंगा बेकार इशारा इन्ही से होगा।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।