निराशा में आशा का संचार करने वाले कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल साहित्य के इस युग में काव्य धारा को नई दिशा देने वाले हैं। उनकी कविताएं सीधे तौर पर परेशानियों की जड़ें पर कुठाराघात करती हैं। उन्हें कुरेदती हैं। उनकी कल्पना शक्ति का सीमांकन समीक्षकों के लिए हमेशा एक चुनौती रहा है। कभी उनके शब्द संगीत में गुंथे हुए लगते हैं तो कभी उनके शब्द अग्नि की ज्वाला में झुलसे कणों की भांति मन में घुसने की कोशिश करते हैं। उनकी कविताओं में एक अभिनेता का भाव है तो बाल बोध भी देखा जा सकता है। उनकी कविताओं में खुद से पूछने का हुनर नहीं है बल्कि समाज से पूछना और खुद को जवाब देने की बजाय समाज को जवाब देने के लिए तैयार करने का भाव समाया हुआ है।
स्वतंत्रता के दौरान रविंद्रनाथ टैगोर की कविताओं ने संघर्ष की बजाय प्रकृति और प्रेम को मानव सभ्यता का मुख्य विधेय माना। इसी तरह वर्तमान युग में विनोद कुमार शक्ल जैसे कवि-कथाकार ने प्रेम और प्रकृति को नए कलेवर में परोसा है। उनका काव्य अंदाज देखिए-
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मै नही जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मै उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़ कर वह खड़ा
हुआ
मुझे वह नही जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे |
यह कविता स्पष्ट रूप से राह की बात करती है। वह कह रही है कि चलते रहने में ही सृजन है। एक दूसरे को जानना अहम नहीं है। बल्कि मानव सभ्यता को सटीक राह की ओर ले जाना सबसे बेहतर है। विनोद जी वास्तविक रूप से दार्शनिक हैं। उनकी छोटी सी कविता भी अपने में उपन्यासों को समाहित किए हुए है। वह भाषा को जितना सरल करते है उनके अर्थ और गहनतम होते जाते हैं। यही विनोद जी की सबसे बड़ी विशेषता है। वह कविता में बहुत धीरे से कुछ कहते हैं लेकिन उसकी गूंज दूर तलक सुनाई पड़ती है। वह रचना करके कहीं दूर चले जाते हैं लेकिन उनकी कविताओं से भाव रस झरते रहते हैं। वह चुप हो जाते हैं लेकिन उनकी कविता बोलते रहती है। उनकी रचनाओं का आशावाद इन लाइनों में मिलता है।
'जो मेरे घर कभी नहीं आएंगें
मै उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊंगा
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊंगा'
विनोद कुमार शुक्ल का काव्य कभी पुराना नहीं होता। दशकों तक इसमें समानता बने रहेगी। हर कविता कुछ न कुछ अर्थ लिए होती है। उसमें कवि का अनुभव समाया होता है। यही उसका सच होता है। सच की सब अपनी-अपनी सोच के आधार पर व्याख्या करते हैं लेकिन मूल उत्स बना रहता है। विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं भी अपना उत्स कायम रखती हैं। तीखे प्रहार करने के बाद वह वस्तुस्थिति को समझने के लिए पाठकों को दूर तलक साथ और सहयोग भी देती है। उन्हें अकेले में छोड़ती नहीं है। बल्कि उन्हें प्रक्षालित करती है।
विनोद जी जब संघर्ष की बात करते हैं तो वह क्रोध और जोश से दूर रहते हैं। भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार पर लिखते वक्त वह काफी शांत बने रहते हैं। वह संघर्ष को जीवन का एक अध्याय मानते हैं। उसे मानव सभ्यता के विस्तार का एक फलक मानते हैं। उत्तरदायित्व का एक पहलू मानते हैं। तभी तो काम करने में असमर्थ एक व्यक्ति पर निशाना साधते हुए विनोद लिखते हैं-
'मै दीवार के ऊपर
बैठा
थका हुआ भूखा हूं
और पास ही एक कौआ है
जिसकी चोच में
रोटी का टुकड़ा
उसका ही हिस्सा
छीना हुआ है
सोचता हूं कि हाय
न मै कौआ हूं
न मेरी चोंच है
आखिर किस नाक नक्शे का आदमी हूं
जो अपना हिस्सा छीन नहीं पाता'