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 चंद्रकांत देवताले: कतरा-कतरा अनुभवों को कविताओं में पिरोना कोई इनसे सीखे

Fri, 01 Dec 2017 04:25 PM IST
काव्य डेस्क / अमर उजाला, नई दिल्ली
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चंद्रकांत देवताले
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महिलाओं और बच्चों को रूपक मानकर समाज के सुख दुख को अपनी कविताओं में पिरोने वाले यशस्वी कवि चंद्रकांत देवताले ने मूल रूप से हिंदी कविता में बदलाव के पक्षधर रहे हैं। जीवन छोटी-छोटी वस्तुओं का संग्रह है। कविता भी कतरा-कतरा अनुभवों की एक लंबी सीरीज होती है। देवताले ने ऐसी ही कविताओं की रचना की। सरल शब्द, आस पास का सुख दुख उनका मूल विषय रहा है। तभी तो लंबे समय तक उनकी कविताएं याददाश्त में बनी रहती हैं। उनकी कविताओं का समग्र मूल्यांकन एक प्रकार से दर्शन मीमांसा हो सकती है। बेटी के विदा का दृश्य हो या प्रेमी हृदय की भावुकता हो सभी का सटीक वर्णन करते हैं। रिश्तों में पिता-माता, बाप-बेटे, दुनियादारी, वजूद और सामाजिक मूल्यों का बखूबी ध्यान देवताले ने अपनी कविताओं में दिया है।  
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मां जब खाना परोसती थी
 
वे दिन बहुत दूर हो गए हैं
जब मां के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था
वे दिन अथाह कुए में छूट कर गिरी
पीतल की चमकदार बाल्टी की तरह
अभी भी दबे हैं शायद कहीं गहरे
फिर वो दिन आए जब माँ की मौजूदगी में
कौर निगलना तक दुश्वार होने लगा था
जबकि वह अपने सबसे छोटे और बेकार बेटे के लिए
घी की कटोरी लेना कभी नहीं भूलती थी
उसने कभी नहीं पूछा कि मैं दिनभर कहाँ भटकता रहता था
और अपने पान-तम्बाकू के पैसे कहाँ से जुटाता था
अकसर परोसते वक्त वह अधिक सदय होकर
मुझसे बार-बार पूछती होती
और थाली में झुकी गरदन के साथ
मैं रोटी के टुकड़े चबाने की अपनी ही आवाज़ सुनता रहता
वह मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती पहचानती थी
और मेरे अकसर अधपेट खाए उठने पर
बाद में जूठे बरतन अबेरते
चौके में अकेले बड़बड़ाती रहती थी
बरामदे में छिपकर मेरे कान उसके हर शब्द को लपक लेते थे
और आखिर में उसका भगवान के लिए बड़बड़ाना
सबसे खौफनाक सिद्ध होता और तब मैं दरवाज़ा खोल
देर रात के लिए सड़क के एकान्त और
अंधेरे को समर्पित हो जाता
अब ये दिन भी उसी कुँए में लोहे की वज़नी
बाल्टी की तरह पड़े होंगे
अपने बीवी-बच्चों के साथ खाते हुए
अब खाने की वैसी राहत और बेचैनी
दोनों ही ग़ायब हो गई है
अब सब अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी से खाते हैं
और दूसरे के खाने के बारे में एकदम निश्चिन्त रहते हैं
फिर भी कभी-कभार मेथी की भाजी या बेसन होने पर
मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती टोहती उसकी दृष्टि
और आवाज़ तैरने लगती है
और फिर मैं पानी की मदद से खाना गटक कर
कुछ देर के लिए उसी कुँए में डूबी उन्हीं बाल्टियों को
ढूँढता रहता हूँ।
 
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प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

देवताले का जीवन मध्यप्रदेश के ऐसे इलाके में पला बढ़ा जहां मराठी बाहुल्य रहा। लिहाजा उनकी कविताओं में हिंदी के सा‌थ मराठी का टच भी उनकी काव्य सामग्री को सुहावना बनाता है। देवताले की कविताएं रसहीन और आधारहीन नहीं है। उनकी संवेदना का अपना आकाश रहा है। उनकी कविताओं में राजनीतिक संवेदनाए भी हैं। वह किसी पर आरोप नहीं लगाती बल्कि सच के साथ समस्या के निराकरण पर जोर देती हैं।  

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

तुम्हारी निश्चल आंखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई
 

दो लड़कियों का पिता होने से

इंदौर उनकी कर्मभूमि रहा। इंदौर की संस्कृति की बढ़िया झलक उनकी कविताओं में मिलती है। देवताले ने वहां अध्यापन कार्य भी किया। उनके कविता संग्रह पत्‍थर फेंक रहा हूं को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। हिंदी कविता के पिछले साठ सालों का अनुनय विनय उनकी कविता में समाहित है। आजादी के दौर से लेकर अब तक हुए वैचारिक बदलाव पर भी उन्होंने अपनी नजर डाली है। समाज के लिए सच क्या होना चाहिए यह समय के साथ परिभाषित होता है। देवताले को इसका पूरा भान था। इसलिए वह अपनी कविताओं में अतिरेक कल्पना का सच नहीं लाते हैं। वह उन्हें वैयक्तिक नहीं सामूहिक धरातल देना चाहते हैं। जहां सबकी नजरें और अनुभव समान संवेदना लिए हुए हैं। ऐसी समग्र और एकाग्र दृष्टि उन्हें सर्वोत्कृष्ट कवि का दर्जा देती है। 

दो लड़कियों का पिता होने से

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी
मैं पिता हूँ
दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए
पपीते की गोद में बैठी हैं
सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही
कितनी हया भर जाती है
शब्दों में
मेरे देश में होता तो है ऐसा
कि फिर धरती को बाँचती हैं
पिता की कवि-आंखें.......
बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ
बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है
कवि का हृदय
एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ
कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है
पत्तियों की तरह
और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से
चाहते हुए उन्हें इतना
करते हुए बेहद प्यार।
 
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ये हैं देवताले की मुख्य रचनाएं

दिलीप चित्रे की कविताओं का उनका अनुवाद काफी चर्चित रहा। इसका शीर्षक पिसाटी का बुर्ज़ है। यह इसी नाम से प्रकाशित है। देवताले के कविता संग्रह हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हंस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ, भूखंड तप रहा है, आग हर चीज़ में बताई गई थी, बदला बेहद महंगा सौदा, पत्थर की बेंच, उसके सपने, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय, जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा, पत्थर फेंक रहा हूं काफी चर्चित रहे।
 
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