आँखों में डूब जाओ तुम
इतना क़रीब आओ तुम
मत सब्र आज़माओ तुम
नज़रें ज़रा हटाओ तुम
ऐ काश! ऐसा हो जाए
बाँहों में आ समाओ तुम
कुछ पल गुज़ार लें हम साथ
सूरत कोई बनाओ तुम
बाग़ों में पड़ गए झूले
सावन है मिलने आओ तुम
दिलशाद है ये मौसम भी
आओ कि आ भी जाओ तुम
पूनम के हाथ हों, उन पर
रंगे-हिना सजाओ तुम
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए
यहां क्लिक करें।