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कुछ तो लोग कहेंगे: नए दौर की कहानियों के जरिए युवा पाठकों के दिल में जगह बनाती किताब

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Kuch to log kahenge by Shivangi - फोटो : Facebook@Shivangi
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एक कहानीकार की सफलता इसी में होती है कि उसका लिखा पढ़ते हुए पाठक के मानसपटल पर दृश्य उभरने लगे। कहानी के पात्रों की कल्पना कर सके, उसका दृश्यरूपण कर सके। हर कहानी के लिए जरूरी नहीं कि वह अंत में किसी नतीजे पर ही पहुंचे। सुखांत और दुखांत के अलावे कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं, जो अधूरी होती हैं या फिर अंत में आपको कुछ सवालों के साथ अकेला छोड़ जाती हैं। एक पाठक को यह अकेलापन भी सुकून देता है। 

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मध्यप्रदेश के होशंगाबाद के खापरखेड़ा की रहने वाली शिवांगी पुरोहित ने भले ही अपना स्नातक(ग्रेजुएशन) भी पूरा नहीं किया है, लेकिन एक लेखिका के तौर पर वह अपनी उम्र से काफी परिपक्व दिखती हैं। वह नए दौर की लेखिका हैं और उनकी नई किताब 'कुछ तो लोग कहेंगे' नए दौर के पाठकों को जोड़ने में सफल होती दिखती है। यह शिवांगी की पांचवी किताब है। इससे पहले उनकी किताब 'सांझी' ने भी पाठकों का ध्यान खींचा था। 

फिलहाल बात उनकी नई किताब की। 'कुछ तो लोग कहेंगे' किशोर और युवा जीवन पर केंद्रित पांच कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों में किशोर से युवावस्था में की गई नादानियों, गलतियों से जीवन के अहम सबक सीखने तक का सफर दिखता है। इन कहानियों में कहीं-कहीं आपको निराशा होती है, कहीं कुछ गैरजरूरी खिंचाव दिखता है, लेकिन सबसे अच्छी बात है कि इन कहानियों में पाठक खुद को कहीं न कहीं जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। 
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हम जिंदगी में कई महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले यही सोचते रहते हैं कि लोग क्या कहेंगे! इस संग्रह की शुरुआत 'क्या कहेंगे लोग' शीर्षक की कहानी से होती है। कहानी का पुरुष पात्र अपने जीवन का एक बड़ा फैसला इसी डर के कारण नहीं ले पाता है कि लोग क्या कहेंगे। कहानी में उसके वैवाहिक जीवन की अपरिपक्वता दिखती है। त्रिलोक और वैभवी की कम उम्र में हुई शादी एक दुखांत पर खत्म होती है, जहां पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। और तब महसूस होता है कि काश 'लोग क्या कहेंगे' के बारे में नहीं सोचा होता। कहानी पढ़ते हुए आपको ऐसा लगता है कि घटना जैसे पड़ोस की, मुहल्ले की, गांव-समाज की हो।  

इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना लिए हर साल न जाने कितने हजारों-लाखों किशोर राजस्थान के शहर कोटा का रुख करते हैं। उनमें से कइयों के सपने पूरे होते हैं तो वहीं अनगिनत किशोर निराशा के साथ लौटते हैं। सपनें, उम्मीदें, संघर्ष और दर्द को समेटे चार किशोरों की कहानी है-कोटा लाइन्स। 

इस किताब की तीसरी कहानी 'रॉन्ग नंबर' का अंत इसके शीर्षक पर होता है। किशोरावस्था में कई बार हमें सही-गलत नजर नहीं आता और हमारे कुछ गलत फैसले हमें जीवन भर पछताने को मजबूर कर देते हैं। 16 बरस की उम्र में प्यार के नाम पर कहानी के पात्र कुछ ज्यादा ही आगे निकल पड़ते हैं। ये गलतियां ऐसे जख्म देती है, जो जिंदगी भर नासूर बने रहते हैं। अंत में हाथ क्या लगता है....यह कहानी पढ़कर जानना रोचक होगा। 

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फीमेल ठग शीर्षक से लिखी चौथी कहानी आपको थोड़ा निराश कर सकती है। एक लड़की है राधिका, जिसके जीवन का कोई ओर-छोर ही नहीं है। एक लड़के को फंसा कर शादी करना और उसकी मौत से पहले और बाद ढेर सारे लड़कों की प्रेमिका बन कर उसे धोखा देना। कहानी के अवसान से पहले उसकी जिंदगी में आई एक एनजीओ से जुड़ी महिला से शायद कहानी की शुरुआत करना सही हो सकता था। यही महिला उस लड़की की वह कहानी दुनिया के सामने लाती है, जो उसकी है ही नहीं। खुद को ठगा महसूस करती है, लेकिन तबतक राधिका के बताए झूठ के पुलिंदों पर लिखी कहानी उसे (राधिका) को संघर्षशील महिला का तमगा दे चुकी होती है। आपको ये भ्रम भी हो सकता है कि कहीं ये महिला किताब की लेखिका शिवांगी तो नहीं। या फिर उसकी कोई करीबी। खैर ये अंतहीन कहानी 10, 20, 30...यहां तक कि 100 पन्ने भी और बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इस कहानी का कोई मतलब न तब निकलता और न ही अब निकलता है। 

आखिरी कहानी 'अधूरे ख्वाब' आपमें से कइयों को अपनी लग सकती है। मीलों हम आ चुके, मीलों जाना बाकी है....ऐसे ख्वाब देखने वाले युवाओं की कहानी। युवा जो गांवों से हैं, ग्रेजुएट कहलाने की दहलीज पर हैं। कहानी के पहले किरदार का संघर्ष और उसके ख्वाब पढ़ते हुए आपको एक बार फिर यह लेखिका की ही कहानी होने का भ्रम हो सकता है, लेकिन अन्य किरदारों के जीवन का संघर्ष पढ़ते हुए आप इससे निकलते हैं और कहानियों के साथ आपकी उत्सुकता बढ़ती जाती है। उत्सुकता इन युवाओं के ख्वाब पूरे होने की। पंख काटे जाने के बावजूद ये युवा आसमान में ऊंची उड़ान भरने को आतुर हैं। कई बार अपने सपने पूरे करने में हम बहुत अकेले पड़ जाते हैं। 

सन्मति प्रकाशन से आई यह किताब इसी महीने आई है और पिछले कुछ हफ्ते से सोशल मीडिया पर चर्चा में है। दरअसल, इन कहानियों में शिवांगी ने सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है, जो पाठकों तक उनकी पहुंच आसान बनाता है। उनका यह कहानी संग्रह युवा पाठकों को खासा पसंद आ रहा है। इन कहानियों के पात्रों के जीवन में जो अच्छे-बुरे दौर आते हैं, जो नीरस या रोचक मोड़ आते हैं, उनमें से कुछ तो पाठकों के जीवन में भी आती होंगी। इन कहानियों को पढ़ते हुए युवा पाठक वैसी गलतियां करने से बच जाएं तो किताब की सार्थकता होगी। 
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