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Book Review: ईस्टर द्वीप की मूर्तियों का अनसुलझा रहस्य, भूली हुई सभ्यता की नई व्याख्या; क्या कहती है यह किताब?

Sun, 01 Feb 2026 06:02 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कुछ ही दिन पहले प्रकाशित यह चर्चित किताब ईस्टर द्वीप (रापा नुई) की रहस्यमयी मूर्तियों के अनसुलझे रहस्यों और वहां की प्राचीन सभ्यता के इतिहास की नए सिरे से पड़ताल करती है, जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है। यह किताब बताती है कि कैसे 1,000 साल पहले पोलिनेशियाई लोगों ने इस निर्जन द्वीप पर एक अद्भुत समाज बसाया, जिसकी कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत आज भी दुनिया को हैरान करती है।
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आइसलैंड एट द एज ऑफ द वर्ल्ड: द फॉरगॉटेन हिस्ट्री ऑफ ईस्टर आइलैंड - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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ब्रिटिश नौसेना के एक चालक दल ने 1868 में रापा नुई (ईस्टर आइलैंड) से एक विशाल पत्थर की मूर्ति की खोज की, जिसे ‘होआ हाका नानाइया’ कहा जाता है। इसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया, क्योंकि आठ फीट ऊंची यह मूर्ति, लंबे चेहरे, भारी भौंहों और चपटी नाक की वजह से अपने शिल्पकारों की अद्भुत कलात्मक शक्ति की गवाह थी। पर इसके साथ एक गहरा रहस्य भी जुड़ा था कि आखिर ये विशालकाय बुत ऐसे वीरान, बंजर और लगभग निर्जन द्वीप पर अस्तित्व में आए कैसे?

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माइक पिट्स की नई किताब आइसलैंड एट द एज ऑफ द वर्ल्ड: द फॉरगॉटेन हिस्ट्री ऑफ ईस्टर आइलैंड इन्हीं रहस्यों की पड़ताल करने का एक साहसिक प्रयास है। पिट्स की यह किताब उस दुनिया को देखने का एक जरिया है, जिसे समय ने भुला दिया और आधुनिकता ने पीछे छोड़ दिया। माइक, जो एक प्रतिष्ठित पुरातत्वविद और लेखक हैं, ने इस पुस्तक में शब्दों को बड़ी ही खूबसूरती से तराशा है। रापा नुई के समाज को कुछ 1,000 साल पहले पोलिनेशियाई नाविकों ने बसाया था। 1722 में डच खोजकर्ता जैकब रोगेवीन ने इसे ‘ईस्टर आइलैंड’ नाम दिया।

जब चालक दल के सदस्य वहां पहुंचे, तब तक बीमारियों, पलायन व कई अन्य कारणों से हजारों की आबादी घटकर मात्र 110 रह गई थी। इसी क्रम में 1913 में, पुरातत्वविद् कैथरीन रूटलेज व स्कोर्सबी रूटलेज रापा नुई पहुंचे। लेकिन यूरोप में छिड़े युद्ध के कारण वहीं फंस गए। 16 महीनों तक उन्होंने वहां के लोगों से बातचीत की तथा लकड़ी के तख्तों पर उकेरी गई लिपियों को समझने की कोशिश की। इंग्लैंड लौटकर रूटलेज ने एक किताब भी लिखी, पर मानसिक बीमारी के चलते 1935 में उनकी मृत्यु हो गई और वह अधूरी रह गई। माइक पिट्स वहीं से शुरुआत करते हैं, जहां रूटलेज ने कहानी को छोड़ा था।
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लेखक ने पेश किया ठोस सबूत
पिट्ज उन दावों को खारिज करते हैं कि रापा नुई के लोग हिंसक थे या उन्होंने पर्यावरण को नष्ट किया। इसके विपरीत, वह ठोस सबूत पेश करते हैं कि यहां के निवासियों ने पर्यावरण का संरक्षण किया और सदियों पहले मिल-जुलकर इन मूर्तियों का निर्माण किया। पिट्स जटिल पुरातात्विक तथ्यों को इतनी सरलता और रोमांच के साथ पेश करते हैं कि एक आम पाठक भी उसमें खो जाता है। माइक पिट्स की लेखन-शैली पाठक के भीतर इस द्वीप का इतिहास जानने की जिज्ञासा पैदा करती है। किताब के अंत में वह फिर होआ हाका नानाइया पर लौटते हैं, जिसके स्वामित्व को लेकर ब्रिटिश म्यूजियम और द्वीप के बुजुर्गों के बीच लंबे समय से विवाद है।

अद्भुत मूर्तियों की असाधारण कहानी
यह किताब ईस्टर आइलैंड की अद्भुत मूर्तियों की असाधारण कहानी का अब तक प्रकाशित सबसे सम्मोहक और व्यापक विवरण है। कुल मिलाकर, यह किताब उन पाठकों के लिए खास है, जिनकी इतिहास में गहरी रुचि है और जो ऐतिहासिक कहानियों को चुनौती देना चाहते हैं। यह उन शोधार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ है, जो रापा नुई जैसी ऐतिहासिक सभ्यताओं के बारे में अपने नजरिये को निखारना चाहते हैं।

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