सयुंक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में भी ये बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर खेतिहर और बिल्डिंग निर्माण में लगे मजदूरों पर पड़ेगा। भारत में 90 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं जिनमें खेती और बिल्डिंग निर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों में मजदूरों को धूप और लू का सामना करते हुए सुबह दस बजे से लेकर शाम पांच बजे तक काम करना पड़ता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 'बढ़ती गर्मी की वजह से दुनिया भर में काम के घंटों में 2.2 फीसदी की कमी आएगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा। साल 1995 में भारत में काम के घंटों में 4.3 फीसदी की कमी आई थी। लेकिन साल 2030 तक ये आंकड़ा 5.8 फीसदी तक बढ़ने की आशंका है।'
साल 2019 में भी ऐसे मामले सामने आए हैं जिनकी वजह से इस तरह की नौकरियों के कम होने के संकेत मिले हैं। बीबीसी ने बिहार में आम मजदूरों पर गर्मी के असर को लेकर एक रिपोर्ट की है। इसमें सामने आया है कि गर्मी की वजह से काम के लिए उपलब्ध मजदूरों की संख्या और काम की उपलब्धता में कमी आई है।
ईंट भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों के संबंध में रिपोर्ट बताती है, 'भारत में करोड़ों लोग अपने गांवों को छोड़कर शहर किनारे बने ईंट भट्टों पर काम करते हैं। इन मजदूरों में बच्चे भी शामिल होते हैं, जो अक्सर निचले सामाजिक-आर्थिक तबके से आते हैं। ये लोग कठिन स्थितियों में काम करते हैं और बदले में काफी कम मजदूरी हासिल करते हैं। कभी-कभी इन मजदूरों को उनकी मजदूरी भी नहीं मिलती है।'
सेंटर फॉर इन्वॉयरन्मेंट स्टडीज के उपनिदेशक चंद्र भूषण ईंट भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं, 'मैंने हाल ही में कई भट्टों का दौरा किया और पाया कि इन भट्टों पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से कहीं आगे बढ़कर 55 से 60 डिग्री तक पहुंच जाता है। यहां काम करना कितना मुश्किल है, ये इस बात से समझा जा सकता है कि यहां काम करने वाले लोग प्लास्टिक या रबड़ से बनी चप्पलें नहीं पहन पाते हैं, क्योंकि वे गर्मी की वजह से पिघल जाती हैं। ऐसे में ये लोग लकड़ी की बनी चप्पलें पहनने पर विवश होते हैं।'
मध्य वर्ग पर क्या होगा असर
देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते तापमान का असर बिजली की खपत के रूप में सामने आ रहा है। बीते मंगलवार को राजधानी दिल्ली में रिकॉर्ड तोड़ 7409 मेगावॉट बिजली खर्च की गई जिसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। न्यूज वेबसाइट लाइवमिंट के अनुसार, पूरे भारत में किसी शहर में एक दिन में इतनी बिजली खर्च नहीं की गई है।
चंद्र भूषण बिजली की खपत के आर्थिक पहलू की ओर ध्यान खींचते हैं। वह बताते हैं, 'बढ़ते तापमान की वजह से दिल्ली में बिजली की खपत सात हजार मेगा वॉट से ज्यादा हो चुकी है। लेकिन अगर आने वाले सालों में ये खपत 12000 तक पहुंच जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि बढ़ती गर्मी लोगों को एयर-कंडीशन और कूलर खरीदने पर मजबूर करती है। इस वजह से गर्मियों में बिजली की खपत बढ़ने लगती है। फिलहाल भारत में करीब 14 से 15 फीसदी घरों में एयर कंडीशन लगे हुए हैं.। लेकिन आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा घरों तक एसी की पहुंच बढ़ेगी, क्योंकि 48-50 डिग्री सेल्सियस में जीना मुश्किल है।'
ऐसे में रोज़गार की कमी का सामना कर रहे मध्य वर्ग पर गर्मी से बचाव के लिए भी क्षमता से ज्यादा खर्च करने का दबाव पड़ेगा।
जीडीपी और अर्थव्यवस्था पर ये होगा असर
इस रिपोर्ट से पहले भी जारी हुए तमाम अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि बढ़ती गर्मी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। लेकिन सवाल उठता है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका कितना असर होगा।
इस रिपोर्ट को लिखने वालीं कैथरीन सेगेट इस सवाल का जवाब देती हैं। वह बताती हैं, 'गर्मी की वजह से मजदूरों की उत्पादकता पर असर पड़ना जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर परिणाम है। हम इस बात की उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले समय में कम आय-वर्ग और ज्यादा आय-वर्ग वाले देशों के बीच आमदनी की खाई काफी बढ़ सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जो पहले से जोखिम भरी स्थितियों में काम कर रहे हैं।'
इसके साथ ही भारत की जीडीपी पर भी इसका भारी असर देखने को मिलेगा क्योंकि तापमान में बढ़ोतरी की वजह से भारत की जीडीपी में 5 फीसदी की कमी आ सकती है।