स्थानीय पत्रकार प्रसेनजीत बताते हैं, "ये विवाद सात साल पुराना है।" लोहरदगा रेलवे स्टेशन से टोरी की तरफ 14 किलोमीटर के बाद बने इस स्टेशन पर साल 2011 में 12 नवंबर को पहली बार ट्रेन का परिचालन हुआ था। तब यहां स्टेशन का नाम लिखने की कोशिश की गई थी। लेकिन, ग्रामीणों के विरोध के कारण ये संभव नहीं हो सका। इसके बाद रेलवे ने कई बार यह कोशिश की लेकिन ग्रामीण जुट गए और नाम नहीं लिखने दिया।
"पिछले साल भी रेलवे के अधिकारियों ने यहां स्टेशन का नाम लिखने की कोशिश की। तब पेंटर ने बड़की लिख भी दिया था। अभी चांपी लिखा जाना बाकी था कि यह खबर कमले गांव में फैली और सैकड़ों ग्रामीण वहां जमा हो गए। फिर लिखे हुए शब्द पर कालिख पोत दी और उसे मिटा दिया गया। इसके बाद से रेलवे ने विवाद के कारण फिर कभी इसका प्रयास नहीं किया।"
बड़कीचांपी के स्टेशन अधीक्षक प्रीतम कोय ने बताया कि कमले और बड़कीचांपी गांवों के लोगों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। "इस कारण हमें नाम लिखवाने में परेशानी हो रही है। दरअसल, स्टेशनों के नामकरण के वक्त स्थानीय लोगों से रायशुमारी की परंपरा है।"
"तब किसी ने इसपर आपत्ति जाहिर नहीं की होगी। तभी इसका नाम बड़कीचांपी प्रस्तावित किया गया होगा। अब हमारे रिकॉर्ड में बड़कीचांपी नाम होने के बावजूद हमलोग इसका डिस्प्ले नहीं कर पा रहे लेकिन टिकटों की बिक्री और दूसरे विभागीय दस्तावेज़ों में रेलवे इसका उल्लेख बड़कीचांपी ही करता है।"
सार्थक पहल की जरूरत
बड़कीचांपी दरअसल लोहरदगा जिले के कुडू प्रखंड की एक पंचायत है। कमले गांव भी इसी पंचायत में है लेकिन रेलवे स्टेशन से बड़कीचांपी गांव की दूरी करीब 2 किलोमीटर है। र्जनभर गांवों के लोग इसी स्टेशन से ट्रेन पर सवार होते हैं।
बड़कीचांपी की मुखिया मुनिया देवी कहती हैं, "इस विवाद के समाधान के लिए सार्थक पहल की जरुरत है। रेलवे को यह पहल करनी होगी। क्योंकि, नाम का लिखा जाना या नहीं लिखा जाना तो बहुच छोटी समस्या है पर लोगों में टकराव बड़ सकता है।"