Jharkhand: असम चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर झामुमो और कांग्रेस के बीच बढ़ा विवाद अब खुली बयानबाज़ी तक पहुंच गया है। झामुमो के तीखे बयान ने गठबंधन की अंदरूनी दरार को उजागर कर दिया है, वहीं भाजपा ने इसे मुद्दा बनाकर दोनों दलों पर हमला तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह टकराव आने वाले समय में गठबंधन की मजबूती पर असर डाल सकता है।
झारखंड की राजनीति में इन दिनों बयानबाज़ी का पारा चढ़ा हुआ है। राज्य में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चल रही गठबंधन सरकार में शामिल दलों के बीच अब मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। झारखंड में साथ-साथ सरकार चला रहे दल असम में अलग-अलग राह पकड़ते दिख रहे हैं, जिससे सियासी रिश्तों में खटास साफ झलक रही है।
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असम चुनाव में नहीं है साथ
दरअसल, असम विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बन सकी। नाराज झामुमो ने पहले 21 सीटों पर और बाद में 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया। इससे गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
JMM प्रवक्ता के बयान से मचा बवाल
इसी बीच झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने एक न्यूज़ चैनल में तीखा बयान देते हुए कांग्रेस को 'विषैला सांप'और भारतीय जनता पार्टी को 'गिरगिट' करार दिया। उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। हालांकि, कांग्रेस ने इस बयान से खुद को अलग कर लिया। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने इसे प्रवक्ता का निजी बयान बताते हुए ज्यादा तूल देने से इनकार किया। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी की सोच इससे अलग है और इसे आधिकारिक रुख नहीं माना जाना चाहिए।
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भाजपा ने गठबंधन पर बोला हमला
वहीं, भाजपा ने इस मौके को लपकते हुए गठबंधन पर जोरदार हमला बोला। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने तंज कसते हुए कहा कि छह साल तक साथ सत्ता चलाते वक्त कांग्रेस ‘विषैला’ नहीं दिखी, लेकिन अब चुनाव आते ही नजर आने लगी है। उन्होंने इसे जनता का ध्यान भटकाने की राजनीति करार दिया।
बिहार चुनाव में दिखी थी खींचतान
गौरतलब है कि इससे पहले बिहार चुनाव के दौरान भी झामुमो और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर खींचतान देखने को मिली थी। अब असम में भी वही स्थिति बनती दिख रही है, जिसका असर झारखंड की राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है। गठबंधन की सियासत में बढ़ती बयानबाजी और आपसी अविश्वास ने यह साफ कर दिया है कि झारखंड में साथ चल रहे दलों के रिश्ते अब पहले जैसे सहज नहीं रह गए हैं। आने वाले समय में इसका असर राजनीति के समीकरणों पर साफ नजर आ सकता है।