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झारखंड हाईकोर्ट का आदेश: संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को नियमित करे राज्य सरकार, 14 से 18 साल से कर रहे थे काम

Sat, 17 Oct 2026 05:37 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

झारखंड हाईकोर्ट ने 14 से 18 वर्षों से संविदा पर कार्यरत 11 मलेरिया और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजरों को नियमित करने का आदेश दिया है। अदालत ने प्रारंभिक नियुक्ति से वरिष्ठता और पेंशन लाभ देने तथा 12 सप्ताह में प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया है।

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झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 14 से 18 वर्षों से संविदा पर कार्यरत 11 मलेरिया टेक्निकल सुपरवाइजरों और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजरों को नियमित करने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने 15 अक्तूबर 2026 को यह आदेश पारित करते हुए स्वास्थ्य विभाग के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसके जरिये 28 अप्रैल, 2025 को कर्मचारियों का नियमितीकरण खारिज कर दिया गया था।

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अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस आदेश की प्रति मिलने के 12 सप्ताह के भीतर सभी संबंधित कर्मचारियों के लिए आवश्यक आदेश जारी करे। यदि नियमित पद उपलब्ध नहीं होते हैं, तो सरकार को कर्मचारियों के समायोजन के लिए सुपरन्यूमेरेरी यानी अतिरिक्त पद सृजित करने होंगे।

नियमित पदों पर समायोजन और नियुक्ति की प्रक्रिया
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार स्वास्थ्य विभाग में मलेरिया टेक्निकल सुपरवाइजर (एमटीएस) और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजर (केटीएस) के नियमित पद सृजित कर कर्मचारियों की सेवा नियमित करे। यदि इन पदों पर समायोजन संभव नहीं होता है, तो कर्मचारियों को मलेरिया इंस्पेक्टर के स्वीकृत और खाली पड़े पदों पर नियमित किया जाएगा।
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याचिका दायर करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत अलग-अलग विज्ञापनों के माध्यम से हुई थी। इन कर्मचारियों को मलेरिया और कालाजार की रोकथाम से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वर्ष 2008 से 2012 के बीच नियुक्त हुए ये कर्मचारी लगातार 14 से 18 वर्षों से सेवा दे रहे हैं और हर साल उनका अनुबंध बढ़ाया जाता रहा। अदालत ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक लगातार सेवा लिया जाना यह सिद्ध करता है कि संबंधित कार्य की आवश्यकता स्थायी प्रकृति की है।

विभेदकारी नीति और सांविधानिक अधिकारों का हनन
इस पूरे विवाद की मुख्य वजह राज्य सरकार की दोहरी नीति रही। सरकार ने इसी कार्यक्रम के तहत काम करने वाले मल्टीपर्पज वर्कर (पुरुष) यानी एमपीडब्ल्यू (एम) के लिए 2,150 पद सृजित करने की प्रक्रिया शुरू की थी और उन्हें नियमित वेतनमान में रखने का फैसला लिया था। हालांकि, इन्हीं वर्करों के कार्यों की नियमित निगरानी करने वाले मलेरिया टेक्निकल सुपरवाइजरों और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजरों के लिए सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। हाईकोर्ट ने सरकार के इस रवैये को पूरी तरह भेदभावपूर्ण और अनुचित करार दिया। अदालत ने कहा कि समान कार्यक्रम के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के साथ बिना किसी तर्कसंगत कारण के अलग व्यवहार करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 का स्पष्ट उल्लंघन है।

पुरानी कानूनी लड़ाई और सेवा संबंधी लाभ
याचिकाकर्ता कर्मचारियों ने नियमितीकरण की मांग को लेकर पूर्व में भी अदालत का दरवाजा खटखटाया था। पूर्व की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 10 सितंबर 2018 को राज्य सरकार को कानून के अनुसार फैसला लेने का निर्देश दिया था। इसके बाद सरकार द्वारा दायर अपील देरी के आधार पर खारिज हो गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 21 फरवरी 2025 को राज्य सरकार को इस मामले पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद सरकार ने कर्मचारियों का दावा खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार अदालत में पूर्व में दिए गए अपने आश्वासनों से पीछे नहीं हट सकती है।

प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण का लाभ
अदालत ने आदेश दिया कि नियमितीकरण का लाभ कर्मचारियों की प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से दिया जाएगा। कर्मचारियों को वरिष्ठता और पेंशन जैसे लाभ प्रदान करने के लिए सेवा की निरंतरता मानी जाएगी तथा उनका काल्पनिक वेतन निर्धारण भी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से होगा। हालांकि, वास्तविक आर्थिक लाभ अदालत के फैसले की तारीख से ही देय होंगे। याचिका लंबित रहने के दौरान मृत हुए कर्मचारी बिरेंद्र प्रसाद को भी उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से नियमित माना जाएगा और उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को नियमानुसार अंतिम भुगतान तथा अन्य सभी लाभ प्रदान किए जाएंगे। अदालत ने चेतावनी दी कि तय समय सीमा में आदेश का पालन न होने पर इसे बेहद गंभीरता से लिया जाएगा।

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