झारखंड हाई कोर्ट ने राजरप्पा परियोजना के लिए 1962 में अधिग्रहित 18.19 एकड़ भूमि के मुआवजा विवाद में ट्रिब्यूनल का 2018 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने अतिरिक्त दस्तावेज स्वीकार करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए।
झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ स्थित राजरप्पा परियोजना के लिए अधिग्रहित 18.19 एकड़ भूमि के मुआवजा विवाद में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) को झटका दिया है। अदालत ने अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त-सह-ट्रिब्यूनल, रांची के वर्ष 2018 के फैसले को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल को भेज दिया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से पेश किए गए अतिरिक्त दस्तावेज विवाद के निष्पक्ष और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इन्हें रिकॉर्ड पर लिया जाना आवश्यक है।
मूल दावेदार टिकेंद्र चौधरी के निधन के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी इस मामले को आगे बढ़ा रहे हैं। अपीलकर्ताओं ने अदालत को बताया कि अधिग्रहित भूमि के बदले मूल दावेदार को सीसीएल में नौकरी दी गई थी, लेकिन भूमि का मौद्रिक मुआवजा आज तक नहीं दिया गया। अपीलकर्ताओं के अनुसार, जिला भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने वर्ष 1989 में ही उक्त भूमि को रैयती मान्यता दे दी थी। परिवार के पास हुकुमनामा, परचा, जमींदारी रसीद और अन्य सरकारी दस्तावेज भी हैं।
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हाई कोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 41 नियम 27 के तहत इन अतिरिक्त दस्तावेजों को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि अपीलीय स्तर पर ऐसे साक्ष्य स्वीकार किए जा सकते हैं, यदि वे मामले में सही निर्णय तक पहुंचने के लिए आवश्यक हों। अदालत ने यह भी कहा कि सीसीएल ने स्वयं स्वीकार किया है कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण किया गया था और मूल दावेदार को संस्थान में नौकरी दी गई थी।
भूमि अधिग्रहण से जुड़ा मामला कई दशक पुराना होने के कारण हाई कोर्ट ने सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को 29 सितंबर को सुबह 10:30 बजे ट्रिब्यूनल के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि सुनवाई के दौरान कोई भी पक्ष अनावश्यक स्थगन नहीं मांगेगा।