कांग्रेस पार्टी की हालत झारखंड में अच्छी नहीं कही जा सकती है। 2009 से अब तक राज्य के चुनावों में पार्टी को जो कुछ भी हासिल हुआ है वो केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन सहयोगी बनने से ही मिला है। यह पहली बार है जब झामुमो, कांग्रेस और राजद, राज्य में एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
इस गठबंधन को उम्मीद है कि ऐसा करने से वह भाजपा के वोट काट सकेंगे और सत्ता तक पहुंचने की राह आसान होगी। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में उसे 14 से ज्यादा सीटें हासिल होंगी। यदि ऐसा नहीं भी होता है तो भी पार्टी विपक्ष में मजबूत स्थिति में रहेगी। लेकिन राज्य में मिलने वाली सीटों की संख्या से कांग्रेस पार्टी केंद्र में भाजपा को घेरने की शक्ति जुटाएगी।
सुदेश महतो
आजसू के प्रमुख सुदेश महतो की पूरी कोशिश है कि वो अपनी पार्टी को एक मजबूत क्षेत्रीय दल के रूप में स्थापित कर सकें। 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने भाजपा की छवि के साथ चुनाव लड़ा था। पार्टी ने आठ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और पांच पर जीत हासिल की थी। 2019 के चुनावों में भी आजसू की आरजू है कि वो किंगमेकर बने। इस बार पार्टी ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि देखना यह होगा कि महतो खुद अपनी सीट सिल्ली को बचा पाते हैं या नहीं।
बाबूलाल मरांडी
मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए गठबंधन का हिस्सा थी। लेकिन सीटों के बंटवारे में असहमति के चलते मरांडी की पार्टी ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया था। झाविमो का भविष्य मौजूदा विधानसभा चुनाव के परिणाम से तय होगा। हालांकि 2009 में पार्टी ने राज्य विधानसभा में 11 सीटें जीती थीं।
सरयू राय
पूर्व भाजपा नेता और रघुवर दास मंत्रिमंडल के सदस्य रहे सरयू राय ने पार्टी से विद्रोह करके जमशेदपुर पूर्व विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है। यह सीट राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास की रही है। यहां का चुनाव परिणाम राय का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगा। सरयू भाजपा में रहते हुए हमेशा रघुवर की नीतियों और फैसलों का मुखर विरोध करते रहे थे। उनका पूरा विधानसभा चुनाव प्रचार भाजपा के विरोध में ही रहा।