जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि टाटा जमशेदपुर शहर में बाहरी लोगों के खिलाफा भेदभाव कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप जमेशदपुर के अधिकांश इलाकों में मूलभूत नागरिक सुविधाएं नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि यह शहर न तो एक इंडस्ट्रियल टाउनशिप है और न ही नगर निगम जैसी किसी चुनी हुई संस्था के अधीन है। जमशेदपुर अभी भी एक अधिसूचित एरिया काउंसिल द्वारा प्रशासित शहर है। इस जनहित याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सरकार को इसे एक साल के भीतर पंचायती राज कानून के तहत चुनी हुई संस्था के हवाले कर देने को कहा था, नहीं तो इसे एक इंडस्ट्रियल टाउनशिप घोषित करने का आदेश दिया था। इस मामले में सरकार ने अभी तक कुछ नहीं किया है।
जमशेदपुर में नगर निगम न होने की वजह से मूलभूत सेवाएं जैसे प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल आपूर्ति, ठोस कचड़ा प्रबंधन और अन्य नागरिक सुविधाएं जैसे सड़क, पार्क आदि की जिम्मेदारी एक बिना चुनी हुई, बिना जिम्मेदारी वाले औद्योगिक संस्थान के पास है।
पीआईएल में 1988 से अब तक की सभी जरूरी बातें: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता जवाहर लाल शर्मा ने कहा जमशेदपुर नगर निगम बनाने के लिए 1988 में याचिका दाखिल हुई थी। 1989 में कोर्ट ने नगर निगम बनाने का आदेश दिया था। टाटा स्टील ने इसे नहीं माना। पटना हाईकोर्ट से स्थगनादेश लिया गया। हाईकोर्ट ने नगर निगम बनाने का आदेश दिया तो फिर टाटा स्टील सुप्रीम कोर्ट चली गई। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट में झारखंड सरकार और टाटा स्टील ने जवाब दिया कि दोनों पक्षों में अधिकतर मसले पर सहमति बन चुकी है। जिन मसले पर असहमति है, वार्ता कर उन पर सहमति बना ली जाएगी। दो साल में कुछ नहीं हुआ। इन सारी बातों से उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया गया है। अब जमशेदपुर नगर निगम बनाने व तीसरा मताधिकार दिलाने का अनुरोध किया है।