मां चैती दुर्गा को समर्पित चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ आज से कलश स्थापना के साथ हुई। चैत्र नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों का आराधना किया जाता है। राजधानी रांची में कई क्षेत्रों में चैती दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है। लेकिन रांची के भुतहा तालाब स्थित चैती दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों का एक अनूठी आस्था है।
बता दें कि पिछले 100 वर्षों से लगातार चैती दुर्गा पूजा महासमिति द्वारा पूजा का आयोजन किया जाता है। झारखंड के विभिन्न इलाकों से मां दुर्गा के भक्त चैत्र नवरात्रि के दौरान अपने-अपने मनोकामना लेकर दर्शन करने पहुंचते हैं।
पूजा का आयोजन सर्वप्रथम 1926 से शुरू हुआ
चैत्र नवरात्रि के अवसर पर राजधानी रांची में भक्तों के बीच एक अलग उत्साह उमंग देखा जाता है। भुतहा तालाब स्थित चैती दुर्गा मंदिर आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर का इतिहास पुराना है। चैती दुर्गा पूजा महासमिति के संजय सिंह ने जानकारी देते हुए बताया, 1925 में अनुरोध राम वर्मा और रामचंद्र साव हजारीबाग गए थे रामनवमी की शोभायात्रा देखने। वहीं, चैत्र नवरात्रि में मां का पूजा देखकर उन लोगों ने प्रण लिया कि रांची में भी मां चैती दुर्गा पूजा की भव्य रूप से की जाए।
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साल 1926 में चैती दुर्गा पूजा महासमिति, भुतहा तालाब का गठन कर पूजा की शुरुआत की गई। उस समय पूजा काफी सीमित रूप में की जाती थी, फिर समय के अनुसार प्रारूप बढ़ता चला गया। जानकारी के अनुसार, रांची में पहली बार चैती दुर्गा पूजा का शुभारंभ चैती दुर्गा पूजा महासमिति भुतहा तालाब के द्वारा ही किया गया था।
100 वर्ष पूरा होने पर किए जा रहे आयोजन
चैती दुर्गा पूजा महासमिति के अध्यक्ष शंकर दुबे ने बताया, इस वर्ष पूजा का 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह पूजा अपने भव्यता के कारण जानी जाती है। इस वर्ष खास आयोजन किए जा रहे हैं। पंडाल की ऊंचाई 45 फीट, चौराई 25 फीट और लंबाई 35 फीट की होगी, जिसमें माता की 13 फीट की दिव्य प्रतिमा स्थपित कर पूजा की जाएंगी। प्रतिमा का निर्माण मूर्तिकार रामपाल के द्वारा किया जा रहा है। पंडाल व प्रतिमा का निर्माण पश्चिम बंगाल के कारीगरों द्वारा कराया जा रहा है। मंत्रमुग्ध करने वाले पूजा पंडाल की साज-सज्जा देखते ही बनेगी।
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विक्रम संवत 2082 के अवसर पर पूजा सम्पन्न कराई गई
मुख्य पुजारी सुभाष चंद्र मिश्रा ने बताया, आज से नूतन वर्ष प्रारंभ हो गया। विक्रम संवत 2082 शुरू हो चुका है एवं आज चैत्र नवरात्रि पर मां भगवती की पहली स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना विधि विधान से की गई।