भले ही रियासत की महिलाएं पढ़ाई के मामलों में पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं, लेकिन रियासत की सियासत में आज भी वह अपने अस्तित्व को ढूंढ रही हैं। ऐसा नहीं है कि चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों में उनकी संख्या कम हो रही है, लेकिन उन्हें अभी तक रियासत की अवाम ने राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है।
इतना ही नहीं, रियासत के बड़े राजनीतिक दल भी अभी तक महिलाओं को उनके 33 फीसदी आरक्षण अधिकार को नहीं दे पाए हैं। आंकड़ों की दृष्टि से देखे तो 2008 में हुए विधानसभा चुनाव की 87 सीटों पर कुल 66 महिलाएं मैदान में उतरीं, लेकिन उनमें से 56 की जमानत जब्त हो गई।
इनमें से तीन महिलाएं जीत दर्ज करने में कामयाब हुईं, लेकिन उनके ऊपर राजनीतिक आकाओं का हाथ था। भले वह पीडीपी की महबूबा मुफ्ती हों या फिर नेशनल कांफ्रेंस की सकीना इट्टू या शमीमा फिरदौस।