जम्मू-कश्मीर में भूमि रिकॉर्ड की डिजिटाइजेशन करने के साथ अब जियो रेफ्रेंसिंग भी होगी, यानी सैटेलाइट मानचित्र से जमीन का असल नक्शा भी देखा जा सकेगा। हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की खंडपीठ ने डिजिटाइज किए गए जा रहे भूमि रिकॉर्ड की जियो रेफ्रेंसिंग के निर्देश दिए हैं। इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए केंद्रीय शहरी विकास विभाग की पूर्व केंद्रीय सचिव डॉ. निवेदिता हरण को विशेषज्ञ स्थानीय आयुक्त तैनात किया गया है। डॉ. हरण के पास किसी भी कार्यालय में जाकर कामकाज की समीक्षा के अधिकार होंगे।
वहीं कोर्ट को सरकार की ओर से बताया गया कि जम्मू और श्रीनगर जिलों में रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अन्य जिलों में इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। मामले में पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राजस्व विभाग के आयुक्त सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्थिति से अवगत कराने के निर्देश दिए थे। वर्चुअल मोड में आयुक्त सचिव शालीन काबरा ने बताया कि जमाबंदी समेत तमाम रिकॉर्ड डिजिटाइज किए जा रहे हैं। यह कार्य प्रगति पर है।
1887 में हुआ था पहला बंदोबस्त
कोर्ट में बताया गया कि सरकार के पास जमाबंदी के रखरखाव का दायित्व है जिसे जम्मू-कश्मीर लैंड रेवेन्यू एक्ट 1996 की धारा 21 के तहत सुनिश्चित किया जाता है। जमाबंदी वह रिकॉर्ड है जिसे किसी भी भूखंड के बंदोबस्त के दौरान तैयार किया जाता है।
जम्मू-कश्मीर में पहला बंदोबस्त वर्ष 1887 में किया गया था। तत्कालीन शासक की ओर से विनगेट नामक शख्स को कुछ गांवों का बंदोबस्त करने के लिए नियुक्त किया गया था। इसके बाद वर्ष 1890 में सर वाल्टर लॉरेंस ने बंदोबस्त की पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया।