भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने बुधवार को जिस तरह की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 'वंदना' की उसने मोदी काल की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी शायद अचंभे में डाल दिया हो!
भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के बयान का स्वागत किया है और कहा, 'वो पीडीपी के साथ औपचारिक तौर पर बातचीत की शुरुआत का इंतजार कर रही है।'
हालांकि भाजपा ने पीडीपी अध्यक्ष की शांति प्रक्रिया, हुर्रियत को बातचीत में शामिल करने, जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष पैकेज जैसी बातों पर खुले तौर पर कुछ नहीं कहा है। दोनों दलों के बीच अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला कुछ वक्त से जारी है।
क्या है इन संकेतों का मतलब
जानकारों का कहना है कि पीडीपी प्रमुख को वाजपेयी की याद ने अचानक से ही नहीं घेर लिया था, बल्कि ये बात किसी खास मकसद को ध्यान में रखकर कही गई थी। कश्मीरियों को संकेत: पीडीपी अगर भाजपा के साथ जा रही है तो उसकी नींव वाजपेयी की 'कश्मीरियों के जख्मों पर मरहम लगाना है' वाली नीति पर आधारित होगी।
एक मतलब ये भी था कि दोनों दलों के बीच कोई 'राजनीतिक समझौता' होगा तो वो नरेंद्र मोदी के कट्टर हिन्दुत्व से दूर होगा, जिसके खौफ को कई जगहों पर कश्मीर में हुए अधिक मतदान का कारण भी बताया गया है। पीडीपी-भाजपा गठबंधन की संभावना को लेकर घाटी में प्रदर्शन भी हुए हैं।
महबूबा ने जम्मू में दिए बयान में कश्मीर की जनता के चुनौतीपुर्ण फैसले की बात भी कही और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की जिम्मेदारी की बात को भी उठाया।
गेंद भाजपा के पाले में: राज्य के दो हिस्सों जम्मू और कश्मीर में वोटिंग के बिल्कुल अलग-अलग पैटर्न की बात उठाकर उन्होंने गेंद अपनी राष्ट्रीयता का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के पाले में डाल दी है। वैसे कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि हो सकता है कि ये बात भाजपा के ही इशारे पर कही गई हो!
बंटे वोट और खतरा, भाजपा का दावा
पूर्व राजनयिक और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने अपने एक लेख में कहा है कि सूबे में जिस तरह की स्थिति उभरती दिख रही है उससे सबसे ज्यादा खुशी अलगाववादियों और पाकिस्तान को होगी।
अय्यर का ये लेख हालांकि चुनाव परिणाम आने के पहले लिखा गया था लेकिन इसमें राज्य के दो अलग-अलग हिस्सों – मुस्लिम-बहुल कश्मीर और हिंदू-बहुल जम्मू; के बीच दो फाड़ की कोशिश और उसके दुष्परिणाम का जिक्र था।
अभी आए नतीजों में भाजपा को सारी 25 सीटें जम्मू क्षेत्र में ही हासिल हुई हैं।
भाजपा का दावा
गुरुवार को भाजपा नेता राज्यपाल एनएन वोहरा से मिले। भाजपा नेता जुगल किशोर ने गवर्नर से मुलाकात के बाद कहा, 'जम्मू-कश्मीर की जनता ने भाजपा को जो मत दिया है वो सरकार बनाने के लिए दिया है।' उन्होंने स्थाई सरकार बनाने की बात भी कही।
इससे पहले, पार्टी ने पीडीपी की तरफ से दूसरे दलों के साथ ‘ग्रांड एलायंस’ की बात को जम्मू-विरोधी बताया था। पीडीपी-कांग्रेस और नेशनल कांन्फ्रेंस के साथ मिलकर एक बड़ा गठबंधन तैयार करने की बात पार्टी के प्रवक्ता नईम अख़्तर के हवाले से आई थी, जिसपर भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।
राजनीतिक विश्लेषक सईद मलिक भी उस स्थिति को खतरनाक मानते हैं जिसमें जम्मू की जनता का प्रतिनिधित्व सरकार में न हो।
आसान नहीं है राह
साल 2008 में अमरनाथ भूमि स्थानांतरण आंदोलन के वक्त लोगों ने जम्मू-श्रीनगर सड़क को बंद कर दिया था, सूबे के दो हिस्से उग्र हो गए थे, हालात मुश्किल से काबू में आ पाए थे। पीडीपी की मुश्किल ये है कि अगर ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि सूबे का एक हिस्सा खुद को उपेक्षित महसूस करता है और तो सरकार चलाना आसान नहीं होगा।
सैलाब से तबाह हुए सूबे में पुनर्निमाण के लिए स्थाई सरकार की आवश्यकता है। उर्दू अखबार चट्टान के मुख्य संपादक ताहिर मुहियुद्दीन के मुताबिक पीडीपी इसी कोशिश में लगी है। मुहियुद्दीन का कहना है कि पार्टी में एक विचार है कि अगर वो भाजपा के साथ नहीं जाती है तो उसे फंड नहीं मिलेंगे जो तबाह कश्मीर को फिर से बेहतर बनाने के लिए जरूरी हैं।
पीडीपी के प्रवक्ता नईम अख्तर ने कहा कि पार्टी के पास विकल्प तो हैं, लेकिन सब मुश्किलों भरे हैं। फिलहाल पीडीपी नेता मुजफ्फर बेग और समीर कौल भाजपा के साथ बातचीत में शामिल रहे हैं। वहीं, कांग्रेस की तरफ से खुद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने मुफ्ती मुहम्मद सईद से फोनन पर बात की है।
कहां-कहां मतभेद
वहीं, महबूबा मुफ्ती के बुधवार के बयान से ये समझा जा रहा है कि पीडीपी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की इच्छुक है। सईद मलिक कहते हैं कि दोनों पार्टियों की विचारधाराओं में इतना अधिक फर्क है कि उसे कम करने और कुछ बिंदुओं पर तैयार होने में थोड़ा वक्त लग सकता है।
सूत्रों का कहना है कि धारा 370 के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान से आकर सूबे में रह रहे विस्थापतों की नागिरकता और दूसरे ऐसे कई सवाल हैं जिन पर पीडीपी और भाजपा को बैठकर एक साझा नीति तैयार करनी होगी। एक मामला ये भी है कि दोनों दल बारी-बारी से मुख्यमंत्री का पद लेंगे या वो किसी एक के पास रहेगा।