नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि उर्दू कभी किसी आस्था या सम्प्रदाय विशेष की भाषा नहीं रही बल्कि एक प्रकार की 'साम्प्रदायिक मानसिकता' के तहत इस भाषा को लेकर 'दुर्भावना' फैलाई जा रही है।
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि स्थानीय भाषाओं को भी समान रूप से सम्मान देने की दरकार है। फारूक ने कहा कि उर्दू देश की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतिनिधित्व करती है। उर्दू का हिंदू और मुसलमान दोनों ने विकास किया है। मुंशी प्रेमचंद और अन्य रचनाधर्मी लोगों ने उर्दू के अस्तित्व के लिए बहुत कुछ किया है।
कश्मीर विश्वविद्यालय में नेशनल काउंसिल फॉर प्रोमोशन आफ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) की ओर से 23वें अखिल भारतीय उर्दू पुस्तक मेला का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में फारूक ने बातें कहीं। अब्दुल्ला ने इस आयोजन के लिए एनसीपीयूएल को धन्यवाद दिया।
उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन उर्दू से लगाव रखने वाले लोगों के लिए अवसरों का एक झरोखा उपलब्ध कराते हैं।