जम्मू-कश्मीर के सीमांत जिलों में बनाई जा रही सुरंगें अब सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं, जिन्हें संघर्ष की स्थिति में बंकरों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कुछ सुरंगों का इसी उद्देश्य से प्रयोग किया गया।
प्रदेश में बनाई जा रही सुरंगें बड़े स्तर पर आवाजाही की दूरी आसान कर रही हैं। ये सुरंगें सुरक्षा लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। सूत्रों का कहना है कि भविष्य में इन सुरंगों का इस्तेमाल पाकिस्तान से संघर्ष की स्थिति में लोगों को बचाने के लिए भी किया जा सकता है।
विज्ञापन
एक तरह से ये सुरंगें बंकर का काम करेंगी। अभी ऑपरेशन सिंदूर में भी कुछ निर्माणाधीन सुरंगों का इस्तेमाल किया गया है।बताया जा रहा है कि इन सुंरगों को सेना अपने ढांचे को बचाने, आम नागरिकों को सुरक्षित रखने, वाहनों को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल कर सकती है।
खासकर सीमांत जिलों में बनाई जाने वाली सुंरगें। मौजूदा समय में सीमांत जिलों राजोरी और पुंछ ही 4 सुरंगें बनाई जा रही हैं। इसके अलावा कई पहाड़ी जिलों में भी सुरंगें बनाया जाना प्रस्तावित है। रक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ये काफी महत्वपूर्ण साबित होंगी। बताते चलें कि राजोरी की दो सुरंगें इसी वर्ष अंत तक बनकर तैयार हो जाएंगी।
विज्ञापन
बंकरों से कम नहीं सुरंगें
सेना के रिटायर बिग्रेडियर विजय सागर का कहना है कि ये सुरंगें इस तरीके से बन रही हैं कि बंकरों से कम नहीं हैं। सुरंगें दोनों तरफ और ऊपर से पहाड़ों से पूरी तरह से कवर हैं। जो गोलाबारी की स्थिति में बंकराें से भी अधिक सुरक्षित हैं। बंकर तो फिर कुछ लोगों को पनाह दे सकता है।
इन सुरंगों में सैकड़ों हजारों लोगों को आश्रय दिया जा सकता है। खासकर राजोरी पुंछ जैसे जिलों में। जो पूरी तरह से पाकिस्तानी गोलाबारी की जद में हैं।सुरक्षाबलों की पहुंच होगी आसान
पूर्व डीजीपी एसपी वैद का कहना है कि राजोरी-पुंछ जैसी जिलों में सुरंगों का निर्माण सुरक्षा के लिहाज से बहुत अहम है। सुरंगों के बनने पर दोनों जिलों की एलओसी के अंत तक जवानों और असलहा पहुंचाने में मदद मिलेगी। राहत एजेंसियां भी अपनी कार्रवाई करने के लिए जल्द पहुंच सकती हैं। क्योंकि जम्मू से कम समय में दूरी तय होगी।